
वीना विग कि कलम से गाँव की चौपाल पर शाम ढल रही थी। मृदंग की थाप और झांझ की झंकार के बीच भागवत कथा वाचक पंडित जी कन्हैया के रूप का बड़ा ही मनमोहक चित्रण कर रहे थे।
उन्होंने वर्णन किया— “मेरे सांवरिया के गले में वैजयंती माला है, कानों में मकराकृत कुंडल झिलमिला रहे हैं, और उनके नन्हे हाथों में जड़े हुए कंगन सूर्य की किरणों को भी मात दे रहे हैं।”
भीड़ के एक कोने में दुबक कर बैठा था मंगल, जो पेशे से चोर था। जहाँ भक्तगण भगवान की छवि देख रहे थे, मंगल उन आभूषणों की चमक का हिसाब लगा रहा था। उसने सोचा, “एक बार यह कन्हैया हाथ लग जाए, तो पूरी जिंदगी चोरी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
पंडित जी की चतुराई और चोर का संकल्प:
कथा समाप्त हुई। पंडित जी भारी-भरकम दक्षिणा की पोटली लेकर सुनसान रास्ते से घर की ओर बढ़े। अचानक मंगल ने उनका रास्ता रोक लिया।
“पंडित जी! बस इतना बता दो कि यह ‘कन्हैया’ कहाँ रहता है? मुझे उसके गहने चुराने हैं।” मंगल की आंखों में लालच और मासूमियत का अजीब मिश्रण था।
पंडित जी कांप उठे। उन्हें लगा कि यह सिरफिरा उनकी पोटली छीन लेगा। उन्होंने तुरंत बुद्धि दौड़ाई और बोले, “अरे भाई, उसका पता तो मेरी इस पोथी (किताब) में है। यहाँ अंधेरा है, जरा उजाले की ओर चलो और यह भारी पोथी तुम उठा लो, मैं हाथ खाली करके ही उसे ढूंढ पाऊंगा।”
लालच में अंधा चोर पंडित जी का सारा सामान सिर पर लादकर बाजार की रोशनी तक आ गया। पंडित जी ने मौका देखा और नाटक करते हुए बोले, “मिल गया पता! वह वृंदावन में रहता है। तुम वहीं जाओ, वह तुम्हें जरूर मिलेगा।” चोर ने पंडित जी के पैर छुए और वृंदावन की ओर दौड़ पड़ा।
खोज: गहनों से गोपाल तक का सफर
रास्ता लंबा था, पर चोर के सिर पर कन्हैया के गहनों का भूत सवार था। वह जिस भी मंदिर से गुजरता, वहाँ जाकर भगवान की मूर्तियों को एकटक निहारता। वह भक्ति से नहीं, बल्कि ‘इन्वेंट्री’ चेक करने की नीयत से देखता कि कंगन कैसे हैं? हार कैसा है?
देखते-देखते उसके अवचेतन मन में कन्हैया की छवि ऐसी बसी कि अब उसे बंद आंखों से भी वही सांवला सलोना रूप दिखने लगा। वह मंदिरों के बाहर सोता, रूखा-सूखा प्रसाद खाता और बस एक ही रट लगाए रहता— “कहाँ हो कन्हैया? बाहर आओ।”
भगवान की लीला: जब चोर ने ‘चोर’ को रिझा लिया
भगवान तो भाव के भूखे हैं। उन्होंने देखा कि यह भक्त तो बड़ा अद्भुत है, मुझे लूटने के लिए दर-दर भटक रहा है। गोपाल ने लीला रची। वे राह चलते कभी बालक बनकर, कभी ग्वाले बनकर मंगल को मिलते और सोने के कंगन दिखाते। पर मंगल झिड़क देता, “हटो बालक! मुझे तो असली कन्हैया के असली आभूषण चाहिए, ये पीतल जैसे कंगन नहीं।”
अंततः वह गोकुल की पावन भूमि पर पहुँचा। यमुना के किनारे, ढलते सूरज की लाली में उसने देखा—वही मयूर मुकुट, वही त्रिभंगी मुद्रा और वही दिव्य चमक! साक्षात भगवान श्रीकृष्ण गाय चरा रहे थे।
मंगल की आँखें फटी रह गईं। भगवान मुस्कुराए और अपने बहुमूल्य आभूषण उतारकर उसके सामने रख दिए— “लो मंगल! तुम इन्हीं के लिए इतनी दूर आए ना? ले जाओ इन्हें।”
परिवर्तन: जब पारस ने लोहे को सोना कर दिया
मंगल ने गहनों को देखा और फिर कन्हैया की मुस्कान को। अचानक उसे उन हीरों-मोतियों में कोई चमक नजर नहीं आई। उसने कांपते स्वर में कहा, “प्रभु! आभूषणों की चमक तो आपके सामने फीकी है। अब मुझे ये पत्थर के टुकड़े नहीं चाहिए… अब तो मैं आपको ही चुराऊंगा!”
भगवान हंसकर बोले, “मुझे चुराओगे? पर रखोगे कहाँ?”
चोर सोच में पड़ गया। वह सोचने लगा कि अगर इन्हें घर ले गया और सो गया, तो कोई और चुरा लेगा। अगर छिपा दिया, तो दीमक लग जाएगी। आखिर में उसने एक तरकीब सोची और बोला:
“प्रभु! जब तक मैं कोई सुरक्षित जगह नहीं ढूंढ लेता, तब तक आप रोज शाम मुझे दर्शन देते रहिए। ताकि मुझे तसल्ली रहे कि मेरी ‘चोरी की अमानत’ सुरक्षित है और आपके पास ही है।”
भगवान भक्त की इस भोली चतुराई पर निहाल हो गए। उन्होंने वादा किया कि वे रोज उसे दर्शन देंगे।
पांडित्य हार गया, प्रेम जीत गया:
मंगल वापस अपने गाँव लौटा। वही पंडित जी फिर कथा बांच रहे थे। मंगल ने हाथ जोड़कर कहा, “पंडित जी, कन्हैया मिल गया!”
पंडित जी को लगा कि चोर मजाक कर रहा है। उन्होंने कहा, “प्रमाण क्या है?”
मंगल ने प्रार्थना की और उसी क्षण कन्हैया वहां प्रकट हो गए। उनके गले का एक दिव्य हार मंगल के हाथ में था। पंडित जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने पोथी बंद की और मंगल के चरणों में गिर पड़े।
“सत्य है! मैं बरसों से उसे शब्दों में ढूंढ रहा था और तुमने उसे अपने हठ और विश्वास से पा लिया। असली साधु मैं नहीं, तुम हो।”


















