
संदीप सबरवल ब्यूरो चीफ के कलम से
हमने गलत प्रोफेशन (पत्रकारिता) चुन लिया. कभी-कभी लगता है जैसे ख़ुद को बर्बाद कर रहे हैं. हमारे फैमिली स्टेटस के हिसाब से यह सही नहीं है.
क्षेत्रीय मुद्दों पर पत्रकारिता करने में न पैसा है न इज्जत. ऊपर से बदनामी मुफ़्त में मिलती है. पहले तो इस बात को रत्ती भर भी नहीं मानते थे, सोचते थे पैसे का क्या ही करेंगे ?? लेकिन वर्तमान में जो गुज़र रहा है उसे सार्वजनिक करने में कोई कुरेज नहीं है. सच्चाई यह है कि पिछले 5 साल में ने तो परिवार को देने भर पैसा मिला और न ख़ुद के लिए फाइनेंसियल फ्रीडम. कॉर्पोरेट माइक उठाके महीनों चिल्लाने के बाद, सच दिखाने के बाद भी कंपनी ने जरूरत के हिसाब से चुटकी में निकाल दिया. सेविंग तो छोड़िए यहाँ रोज़मर्रा मुश्किल हो जाता है. तभी सोचने लगे आख़िर सामाजिक सेवा करते-करते ख़ुद का The End न कर लूँ. ऊपर से ईमानदार रिपोर्टर का चोला पहने घूम रहे! फिर भी लोग ‘पैसे लेने का’ आरोप लगा देते हैं. पक्षपाती होने का सर्टिफिकेट दे देते हैं, तब जाके समझ आ रहा कि दुनिया कैसी है… आज जब एक साथ पापा की बीमारी, दादा का मृत्यु भोज, भाई की पढ़ाई, सामाजिक कार्य और ख़ुद के खर्चे का बोझ आया तो लाखों कर्ज हो गए. ऐसे में ख़ुद को समझ पाना मुश्किल हो रहा है.
कभी लगता है ये सब छोड़ के पैसे कमा लूँ और घर वालों का जरूरत पूरा कर दूँ, तो कभी लगता है सामाजिक, राजनीतिक अन्याय से लड़ लूँ. मन क्रांति भी करना चाहता है और ज़रूरतें सता भी रही है. लेकिन जब सामने अपने पारिवारिक भावनाओं को टूटते-बिखरते देख रहा हूँ तो कुछ भी करने का मन नहीं करता. और पिछले 4 महीने से इसी हलचल को रोज़ झेल रहा हूँ. 3 महीने से न्यूज़ चैनल और कंपनी को छोड़ चुका हूँ. “राँची से गाँव और गाँव से राँची”बस यही सिलसिला चल रहा है. जब भी सोच रहा हूँ कुछ बड़ा और अपना करना है तब-तब एक हॉपिटल प्रॉब्लम आ जा रहा है. अपने परिजन को परेशान और बेबस देखके न जॉब करने का इक्षा हो रहा है और न ही ख़ुद के पेज पर काम. अगली कदम को लेकर बस प्लानिंग और प्लानिंग ही मन में चल रहा है. फिर भी पॉजिटिव हूँ कि कुछ अच्छा होगा. अब आगे बुद्धिजीवी चाहने वाले लोगों से परामर्श चाहता हूँ.



















