
आज समाज में कई लोग अकेले इसलिए नहीं हैं
कि उन्हें रिश्ता नहीं मिला…
बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने रिश्तों की असली सच्चाई बहुत करीब से देख ली है।
लोग बाहर से पूछते हैं…
जबकि आज अंदर से सब जानते है सच क्या है
पर फिर भी कुरेदना इनको अच्छा लगता है
आज लड़का और लड़की दोनों ही
बहुत हद तक अकेले ही रहना चाहते है
कारण अनगिनत है …
कितने धोखे ,संवेदना का मर जाना,रिश्तों में सिर्फ अहम, और वहम का रह जाना..
किसी ने उस भीड़ से अलग रहने का फैसला किया होगा।
एक समय था जब
पति-पत्नी का रिश्ता भरोसे, वफादारी और इज़्ज़त का
घर बसाना जिम्मेदारी माना जाता था
और रिश्ते निभाना संस्कार।
लेकिन धीरे-धीरे
कुछ लोगों ने रिश्तों को रिश्ता नहीं, “मौका” समझना शुरू कर दिया।
कहीं छुपे हुए संबंध,
कहीं दिखावे की दोहरी ज़िंदगी,
कहीं wife swapping जैसी चीज़ों को “modern” कहकर सही ठहराया जा रहा है,
और कहीं
मर्द से मर्द के रिश्तों को भी अलग-अलग नाम देकर ट्रेंड बना दिया गया है।
और आज कल तो एक और नया चलन औरतों का भी औरतों से रिश्ता…
अब कोई कैसे किसी पर विश्वास करेगा…?
फिर वही समाज
किसी को अकेला देखकर ताना देता है…
“तुम्हारा घर क्यों नहीं बसा?”
लेकिन सच यह है कि
हर अकेला इंसान नाकाम नहीं होता।
कई लोग इसलिए अकेले होते हैं क्योंकि
उन्होंने बहुत करीब से देख लिया होता है कि
कैसे लोग सामने संस्कारों की बातें करते हैं
और पीछे से रिश्तों को हवस और समझौते का खेल बना देते हैं।
और यहाँ एक बात समझना भी जरूरी है …
गलत रास्ते पर चला हर इंसान हमेशा पूरी तरह खुद ही दोषी नहीं होता।
कई बार
गलती उस परवरिश की भी होती है
जहाँ माँ-बाप लालच, दिखावे या गैरजिम्मेदारी में
अपने बच्चों को सही-गलत का फर्क सिखा ही नहीं पाते।
जहाँ
संस्कार, मर्यादा और जिम्मेदारी सिखाई जानी चाहिए थी,
वहाँ
बस पैसा, स्टेटस और दिखावा सीखा दिया जाता है।
फिर वही बच्चे बड़े होकर
रिश्तों की कीमत नहीं समझ पाते।
उनके लिए रिश्ता
समर्पण नहीं, सिर्फ एक अनुभव या खेल बनकर रह जाता है।
इसीलिए जब चारों तरफ
दिखावा, स्वार्थ और गिरती हुई सोच का बाजार दिखाई देता है,
तो कुछ लोग
भीड़ में रहकर भी अलग रास्ता चुन लेते हैं।
क्योंकि
समझौते वाले रिश्तों में घुटकर जीने से बेहतर है
आत्मसम्मान के साथ अकेले जीना।
बच्चों को सिर्फ पैसा और आज़ादी नहीं,
सही-गलत का संस्कार भी दीजिए…
वरना वही बच्चे बड़े होकर रिश्तों को खिलौना समझने लगते हैं।
सवाल समाज से….?
क्या “modern” बनने का मतलब रिश्तों की मर्यादा खत्म कर देना है?
या फिर वफादारी, संस्कार और आत्मसम्मान बचाकर जीना ही असली प्रगति है?
अगर आप भी मानते हैं कि
रिश्ते ट्रेंड या हवस से नहीं,
संस्कार और वफादारी से चलते हैं,
तो इस बात को आगे बढ़ाइए…?
शायद किसी माँ-बाप को आज ही अपनी परवरिश पर सोचने की जरूरत महसूस हो जाए।
वरना तो जो आज प्रत्यक्ष हम देख रहे है 🙏🏼 उससे भी कही भयानक होता हुआ देखेंगे..
क्यों कि भगवान ने स्त्री पुरुष की रचना
ऐसे ही नहीं कर डाली थी कुछ तो सोचा ही होगा?
ऐसे में समाज को थोड़ी देर के लिए दूर कर भी दे तो
क्या हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर नहीं होगा क्य


















