April 19, 2026 11:15 pm

“जिस्म का भूखा कौन…?” अगर सुहागरात के बाद किसी लड़की को पता चले कि उसका पति शारीरिक रूप से अक्षम है,

“जिस्म का भूखा कौन…?”

अगर सुहागरात के बाद किसी लड़की को पता चले कि उसका पति शारीरिक रूप से अक्षम है,

तो समाज कहेगा —

“बेटी, तुम्हारा पूरा हक है… तलाक लो, मुआवजा लो, नई जिंदगी शुरू करो।”

लेकिन अगर किसी पुरुष की पत्नी को पति में कोई रुचि ही न हो…

वह न उसके साथ संबंध बनाना चाहती हो,

न उसके साथ जीवन जीना चाहती हो,

और उसकी भावनाएँ किसी और दिशा में हों…

तो वही समाज उस पुरुष से कहता है —

“समझौता करो… मर्द बनो… सहन करो।”

कभी सोचा है…

जिस रिश्ते में भावनाएँ, स्पर्श और अपनापन ही खत्म हो जाए,

उस रिश्ते में सिर्फ एक आदमी क्यों घुटता रहे..?

सच यह है कि

दर्द सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं होता, पुरुष भी टूटते हैं।

लेकिन फर्क सिर्फ इतना है —

स्त्री रो दे तो समाज सहानुभूति देता है,

पुरुष रो दे तो समाज कहता है —

“मर्द होकर रोता है?”

हम यह नहीं कहते कि महिलाओं की सुरक्षा के कानून गलत हैं।

उनकी जरूरत भी है और सम्मान भी।

लेकिन यह भी सच है कि

कानून का दुरुपयोग भी एक सच्चाई है,

जिसकी चर्चा करने से लोग डरते हैं।

याद रखिए —

हर पुरुष दरिंदा नहीं होता।

वही पुरुष किसी का पिता,

किसी का भाई,

किसी का बेटा भी होता है।

इसलिए न्याय की बात हो तो

तराजू दोनों तरफ बराबर होना चाहिए।

क्योंकि

इंसाफ अगर सिर्फ एक तरफ हो,

तो वह इंसाफ नहीं…

बल्कि एक नई नाइंसाफी की शुरुआत बन जाता है।

सोचिएगा जरूर…

क्योंकि बेटे भी किसी के दिल के टुकड़े होते हैं,

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