
आरती चढ़ा ब्यूरो चीफ मेट्रो टुडे कर्नाटक में एक किसान ने अपना ₹50,000 का कर्ज पूरी ईमानदारी से चुका दिया।
उसे लगा कि अब बैंक और उसके बीच का हिसाब बराबर हो चुका है।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है…
कुछ महीनों बाद Canara Bank की ओर से सूचना आई कि उसके खाते में ₹9.34 अभी भी बकाया हैं!
सोचिए ज़रा — ₹50,000 चुका देने के बाद ₹9.34 का नोटिस!
💰 किसान ने क्या किया?
किसान सीधे बैंक पहुंचा।
उसने ₹10 का नोट दिया… और बड़ी गंभीरता से कहा —
“मेरे 66 पैसे वापस दीजिए।”
बैंक कर्मचारी चौंक गए।
लेकिन किसान की बात में दम था।
उसने साफ कहा —
“जब बैंक हमसे एक-एक पैसा वसूलता है, तो हम अपना पैसा क्यों छोड़ें?”
🤔 सवाल बड़ा है
क्या यह सिर्फ 66 पैसे की बात है?
या फिर यह उस व्यवस्था पर तंज है, जहां आम आदमी से छोटी से छोटी रकम भी पूरी ली जाती है?
किसान का यह कदम एक तरह से सिस्टम को आईना दिखाने जैसा था —
हिसाब बराबर तो बराबर ही होना चाहिए, चाहे रकम कितनी भी छोटी क्यों न हो।
📌 सोशल मीडिया पर चर्चा
यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है।
लोग इसे “सच्चा हिसाब-किताब” और “आम आदमी की जीत” बता रहे हैं।
क्योंकि बात पैसों की नहीं, सिद्धांत की है।
और सच तो यह है —
जहां बात मेहनत की कमाई की हो, वहां 66 पैसे भी कम नहीं होते।


















