
टिकट दिखाइए!ट्रेन छूट रही थी, बच्चे स्टेशन पर रो रहे थे। जल्दबाज़ी में चढ़ गई, टिकट लेने का वक़्त ही नहीं मिला… और पैसे भी…उसकी आवाज़ डर से टूट रही थी। उसे लगा कि अब अगले ही स्टेशन पर उन्हें ज़लील करके उतार दिया जाएगा।
ट्रेन का जनरल डिब्बा खचाखच भरा हुआ था। तभी एक स्टेशन से एक बदहवास सी औरत अपने चार छोटे-छोटे बच्चों को खींचते हुए किसी तरह अंदर घुसी।
उसके मैले कुचैले कपड़े और माथे पर चमकता पसीना साफ बता रहा था कि जिंदगी ने उसे बहुत थकाया है। बच्चे भूख से कुनमुना रहे थे और माँ डरी-सहमी सी उन्हें एक कोने में समेटने की कोशिश कर रही थी। ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी ही थी कि तभी डिब्बे में ‘काले कोट’ वाले TTE साहब की एंट्री हुई।
यह आवाज़ सुनते ही उस माँ के चेहरे की बची-खुची रंगत भी उड़ गई। डर के मारे उसकी जान हलक में आ गई। उसने कांपते हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू पकड़ा और रुंधे गले से बोली, साहब… डिब्बे में सन्नाटा छा गया। हर कोई इंतज़ार कर रहा था कि अब TTE का पारा चढ़ेगा।
TTE साहब की सख्त निगाहें पल भर के लिए उन चार मासूम, भूखे और सहमे हुए चेहरों पर जाकर टिक गईं। उनके चेहरे की सारी कठोरता बर्फ की तरह पिघल गई। उन्होंने अपनी रसीद बुक निकाली, लेकिन जुर्माना ठोकने के लिए नहीं। उन्होंने अपनी जेब से पैसे निकाले, उस माँ और बच्चों का वैध टिकट काटा और उनके हाथ में थमाते हुए बड़ी नरमी से कहा, घबराओ मत बहन, आराम से बैठो।
इतना ही नहीं, अगले स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी, तो वो TTE साहब अपनी तरफ से उन बच्चों के लिए समोसे और पानी की बोतलें लेकर आए। उस माँ की आँखों से जो आंसू गिरे, वो अब खौफ के नहीं, बल्कि एक अजनबी के रूप में मिले फरिश्ते के लिए इंसानियत के आंसू थे।
सिस्टम और व्यवस्था चलाने के लिए नियम-कानून बहुत ज़रूरी हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन समाज को ज़िंदा रखने के लिए जिस चीज़ की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, वो है— ‘इंसानियत’। आज के दौर में जहां हम अक्सर सरकारी कर्मचारियों और सिस्टम की कमियां निकालते हैं, वहीं ऐसे लोग भी हमारे बीच मौजूद हैं जो अपनी ड्यूटी के साथ-साथ अपना ज़मीर भी पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं।
कानून कागज़ पर लिखा जाता है, लेकिन इंसानियत दिलों पर लिखी जाती है।


















