
वीना विग एडिटर की रिपोर्ट
बेंगलुरु के मराथाहल्ली के रहने वाले श्री सोमसुंदर जी का हंसता-खेलता परिवार था। दो बेटियां, जिनमें बड़ी बेटी श्वेता को उन्होंने पाल-पोसकर इंजीनियर बनाया। हर ख्वाहिश पूरी की, खून-पसीने की कमाई से पढ़ाया-लिखाया ताकि बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।
लेकिन जैसे ही पैर लगे, पंख निकल आए… और उन पंखों ने अपनों को ही ज़ख्म देना शुरू कर दिया।
🔹 ‘कंट्रोल’ और ‘टॉक्सिक’ के नाम पर अपनों से दूरी
श्वेता को एक ईसाई लड़के केनेथ से प्यार हुआ। मां मुथुलक्ष्मी ने टोकना चाहा—जैसा कि हर मां अपनी बेटी की सुरक्षा और भविष्य के लिए करती है। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी, “एजुकेटेड” श्वेता को मां की ममता ‘गुलामी’ और ‘दकियानूसी’ लगने लगी। नौकरी लगते ही वह ‘वर्क फ्रॉम होम’ और आज़ादी का बहाना बनाकर बॉयफ्रेंड के साथ बिना बताए फ्लैट में शिफ्ट हो गई।
🔹 जब ‘मेरी मर्ज़ी’ बन गई बर्बादी की वजह
केनेथ के कहने पर श्वेता ने 30 लाख का बिजनेस लोन लिया, पता अपने पिता के घर का डाला। स्टार्टअप फेल हुआ, बैंक के नोटिस पिता के घर आने लगे। अब इस कर्ज़ को चुकाने के लिए केनेथ ने श्वेता को पिता की संपत्ति में आधा हिस्सा मांगने की पट्टी पढ़ाई।
रविवार की शाम: ममता की मारी मां मुथुलक्ष्मी बेटी का फोन पाकर खुशी-खुशी उससे मिलने फ्लैट पर पहुंची। वहां जब संपत्ति का बंटवारा और उस लड़के को देखा, तो मां का गुस्सा फूटना लाज़मी था।
नतीजा? “मेरी ज़िंदगी, मेरी मर्ज़ी” के अहंकार में अंधी हो चुकी बेटी ने अपनी ही मां पर चाकू से 50-52 वार कर डाले! मां ने वहीं तड़पकर दम तोड़ दिया।
🔹 रिश्तों का ऐसा खौफनाक अंत!
क्रूरता की हद यहीं खत्म नहीं हुई। सोमवार को पिता सोमसुंदर और 19 साल की छोटी बहन सुप्रिया को बुलाया गया। फ्लैट में कदम रखते ही दोनों पर चाकुओं से हमला कर दिया गया। मासूम सुप्रिया वहीं ढेर हो गई, और पिता सोमसुंदर 30-32 घाव खाने के बाद किसी तरह जान बचाकर बाहर भागे, लेकिन अस्पताल में उन्होंने भी दम तोड़ दिया।
गिरफ्तारी के बाद श्वेता का बयान:
“मेरे माता-पिता मेरी ज़िंदगी को पूरी तरह कंट्रोल कर रहे थे। मुझे कोई आज़ादी नहीं थी। इसलिए मैंने यह मर्डर किए।”
कुछ सुलगते सवाल:
क्या मां-बाप का बच्चों को सही-गलत के लिए टोकना ‘टॉक्सिसिटी’ है?
जिस पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वह नौकरी लगते ही ‘दुश्मन’ कैसे हो गया?
क्या आज की तथाकथित ‘आज़ादी’ और ‘सशक्तिकरण’ का मतलब संस्कारों, मर्यादाओं और अपने ही माता-पिता की बली चढ़ा देना है?
लानत है ऐसी पढ़ी-लिखी और अंधी आज़ादी पर, जो अपनों के ही खून से हाथ लाल कर दे।
धर्म, संस्कार और माता-पिता के त्याग को ‘ओल्ड स्कूल’ समझने वाली पीढ़ी को यह सोचने की ज़रूरत है कि वे किस रास्ते पर जा रहे हैं।



















