
सुशील शंकर विग एडिटर इन चीफ की रिपोर्ट कोलकाता के गलियारों में सन्नाटा है और कालीघाट के रणनीतिकारों के माथे पर पसीना..!
बंगाल की राजनीति की ‘अग्निपुत्री’ कही जाने वाली ममता बनर्जी आज उस दोराहे पर खड़ी हैं, जहाँ उनके हर रास्ते पर काँटों की बाड़ लगा दी गई है,
सवाल यह नहीं है कि सरकार कैसे चलेगी, सवाल यह है कि दीदी’अब कहाँ बैठेंगी….?
उपचुनाव का ‘सुवेंदु फोबिया’
अगर दीदी किसी वफादार विधायक से इस्तीफा दिलवाकर फिर से विधानसभा की दहलीज लांघने की कोशिश करती हैं, तो सामने ‘नंदीग्राम के नायक’ सुवेंदु अधिकारी** दीवार बनकर खड़े हैं।
सुवेंदु ने पहले ही उन्हें दो बार धूल चटाई है, और तीसरी बार की जंग दीदी के राजनीतिक करियर के लिए ‘करो या मरो’ जैसी होगी।
क्या दीदी सुवेंदु के गढ़ में फिर से हारने का जोखिम लेंगी..?
2. राज्यसभा का गणित: हाथ से फिसलती बाजी..!
एक समय था जब बंगाल विधानसभा में टीएमसी का एकछत्र राज था।
लेकिन आज गणित बदल चुका है।
अगर कोई राज्यसभा सांसद इस्तीफा देता है, तो संख्या बल (Numbers Game)की कमी के कारण भाजपा उस खाली सीट पर कब्जा करने के लिए तैयार बैठी है।
अपनी एक सुरक्षित सीट भाजपा की झोली में डालना दीदी के लिए ‘पॉलिटिकल सुसाइड’ (राजनीतिक आत्महत्या) जैसा होगा।
3. दिल्ली अभी बहुत दूर है..!
2029 तक लोकसभा के दरवाजे भी बंद हैं। ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में ‘किंगमेकर’ बनने का सपना देखने वाली दीदी के पास फिलहाल संसद जाने का कोई वैध पासपोर्ट नहीं है।
तो अब दीदी क्या करेंगी…?
सुबह उठकर कहाँ जाएँगी..?
जब सत्ता की कुर्सी डगमगाती है, तो सड़कों का संघर्ष ही सहारा होता है।
दीदी के पास अब केवल ये विकल्प बचे हैं:
*सड़कों पर ‘खेला’: विधानसभा न जा पाने की खीज को वह जनता के बीच ले जाएंगी।
वह हर दिन नबान्न (सचिवालय) की जगह बंगाल के गाँवों में ‘पदयात्रा’ करती नजर आ सकती हैं।
पार्टी की ‘पूर्णकालिक’ बॉस,
अब उनके पास प्रशासन से ज्यादा संगठन पर ध्यान देने का वक्त होगा।
वह टीएमसी के भीतर उठ रहे बगावती सुरों को कुचलने और अभिषेक बनर्जी की राह आसान करने में अपनी ऊर्जा लगा सकती हैं।
विपक्ष की ‘अघोषित’ सेनापति..!
विधानसभा के बाहर रहकर वह भाजपा के खिलाफ एक ऐसा नैरेटिव सेट करने की कोशिश करेंगी कि उन्हें ‘साजिश’ के तहत रोका गया है।
राजनीति में कोई भी रास्ता कभी पूरी तरह बंद नहीं होता, लेकिन इस वक्त ममता बनर्जी एक चेक-मेट’ (शह और मात)की स्थिति में फंसी हुई हैं।
सुवेंदु अधिकारी की चुनौती और गिरता हुआ बहुमत उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देगा।
अब देखना यह है कि बंगाल की यह ‘बाघिन’ इस पिंजरे को तोड़कर बाहर निकलती है या इतिहास के पन्नों में एक ‘पूर्व मुख्यमंत्री’ बनकर सिमट जाती है।



















