

आरती ब्यूरो चीफ की कलम से 2011 का वो सुनहरा साल। कौन बनेगा करोड़पति के स्टेज पर रोशनी चमक रही थी। अमिताभ बच्चन की गहरी आवाज़ गूंज रही थी “कॉन्फिडेंट?” सामने बैठी थी एक साधारण सी महिला, आँखों में जज्बा, जवाबों में तेज़ी। नाम था अमिता सिंह तोमर । तहसीलदार बनने का सपना देखने वाली यह महिला अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से एक-एक सवाल पार करती गई। आखिरकार, ₹50 लाख की राशि उसके नाम हो गई।
पूरे देश ने तालियाँ बजाईं। अखबारों की सुर्खियाँ चमक उठीं KBC वाली मैडम। लोग कहते, “देखो, मेहनत और ज्ञान से कितना कुछ हासिल किया जा सकता है।” अमिता सिंह तोमर प्रेरणा बन गईं। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहीं कभी प्रशासन की बातें, कभी ट्रांसफर की परेशानियाँ, कभी संविधान और राजनीति पर अपनी राय। “KBC वाली मैडम” अब सिर्फ एक नाम नहीं, एक पहचान बन चुकी थीं।
समय बीता। नौकरी के 13 सालों में 25 ट्रांसफर झेले। लेकिन किस्मत अभी भी साथ थी। वे तहसीलदार बन चुकी थीं। बड़ौदा तहसील, श्योपुर जिला, मध्य प्रदेश।
फिर आया 2021। आसमान फट पड़ा। श्योपुर में भयंकर बाढ़ आई। घर डूबे, फसलें बर्बाद हुईं, लोग बेघर हुए। सरकार ने राहत राशि मंजूर की। बड़ौदा तहसील में 794 असली बाढ़ पीड़ित परिवारों को मुआवजा बाँटने का जिम्मा था। अमिता सिंह तोमर उस समय वहाँ तहसीलदार थीं। जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी पीड़ितों तक मदद पहुँचानी थी।
लेकिन जांच जब शुरू हुई तो सच सामने आया। 794 असली परिवारों की जगह, 127 फर्जी खातों में पैसा ट्रांसफर कर दिया गया। कुल मिलाकर ढाई करोड़ रुपये (लगभग ₹2.5 से 2.57 करोड़) गबन हो गए। आरोप लगा कि यह राशि रिश्तेदारों, जान-पहचानों वालों या काल्पनिक नामों के खातों में चली गई। असली पीड़ित खाली हाथ रह गए। जांच में पटवारी, दलाल और अन्य अधिकारियों का भी नाम सामने आया। कुल 110 से ज्यादा नाम एफआईआर में दर्ज हुए। अमिता सिंह तोमर मुख्य आरोपी बन गईं।
कोर्ट का शिकंजा कसा। हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत की याचिका खारिज हुई। फिर सुप्रीम कोर्ट भी राहत नहीं दे सका। 26 मार्च 2026 को पुलिस की टीम ग्वालियर पहुँची। चंद्रावदनी नाका स्थित उनके घर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक दिन पहले ही कलेक्टर अर्पित वर्मा ने उन्हें विजयपुर तहसीलदार के पद से हटा दिया था।
श्योपुर कोर्ट में पेशी हुई। अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। शिवपुरी की महिला जेल में सलाखों के पीछे…
वो महिला, जिसने एक बार अमिताभ बच्चन के सामने “लाइफलाइन” इस्तेमाल कर आगे बढ़ी थी, आज असल ज़िंदगी में कोई लाइफलाइन बाकी नहीं बची। 50 लाख से 2.5 करोड़ तक का सफर… खुशियों से शुरू होकर घोटाले और जेल में खत्म।
कहते हैं, किस्मत का खेल बड़ा अजीब होता है। एक पल में हीरो, दूसरे पल में आरोपी। अमिता सिंह तोमर की कहानी भी यही बताती है शोहरत की चमक कितनी जल्दी मिट सकती है, जब जिम्मेदारी और ईमानदारी का साथ छूट जाए।
अब जांच आगे बढ़ रही है। कई और नाम सामने आ सकते हैं। लेकिन इस कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू वो 794 परिवार हैं, जिनकी मदद कभी नहीं पहुँची और वो “KBC वाली मैडम”, जिनकी कहानी अब सिर्फ एक सबक बनकर रह गई है।
किस्मत का पलटा कभी तालियाँ, कभी सलाखें।
नरेन्द्र सहारण


















