
अनिल ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट आज के इस दौर में ‘#OYO’ शब्द किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस नाम को #पर्यटन और सुगम निवास के लिए जाना जाना चाहिए था, वह आज समाज की नजरों में ‘आधुनिक #वैश्यालय’ और ‘#अनैतिकता के अड्डे’ का पर्यायवाची बनता जा रहा है। गली-मोहल्लों में #कुकुरमुत्तों की तरह खुले ये ‘OYO’ होटल आखिर किसके #संरक्षण में फल-फूल रहे हैं?
#सत्ता और #तंत्र की रहस्यमयी #चुप्पी
सवाल कड़वा है पर जरूरी है: यदि इन केंद्रों का उपयोग खुलेआम देह व्यापार और #अनैतिक गतिविधियों के लिए हो रहा है, तो #सरकार और #पुलिस_प्रशासन ने अपनी आँखें क्यों मूँद रखी हैं? क्या खाकी और #खादी की #सरपरस्ती के बिना #रिहायशी इलाकों में इस तरह का ‘अंधेरगर्द’ संभव है?
जब भी किसी बड़े #अपराध या #तस्करी का मामला सामने आता है, तो अक्सर उसके तार इन्हीं होटलों से जुड़े मिलते हैं। फिर भी, पुलिस की कार्रवाई केवल ‘खानापूर्ति’ के लिए किए गए छिटपुट छापों तक ही सीमित क्यों रह जाती है? क्या यह माना जाए कि ‘#सुविधा_शुल्क’ की मोटी #रकम ने तंत्र के इक़बाल को #गिरवी रख दिया है?
कानून की आड़ में नैतिकता का कत्ल
सरकार का तर्क हो सकता है कि ‘सहमति से बने शारीरिक संबंध’ अपराध नहीं हैं। लेकिन ‘सहमति’ और ‘व्यावसायिक देह व्यापार’ के बीच की जो महीन रेखा है, उसे ये होटल पूरी तरह मिटा चुके हैं। एक आईडी और कुछ चंद रुपयों के बदले कमरे उपलब्ध कराना क्या सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की सोची-समझी साजिश नहीं है?
क्या कोई विशेष प्रयोजन है?
अक्सर यह चर्चा उठती है कि क्या सरकार इस ‘आधुनिक वैश्यावृत्ति’ को किसी विशेष रणनीति के तहत फलने-फूलने दे रही है? चाहे वह राजस्व का लालच हो या युवाओं की ऊर्जा को अनैतिकता की गर्त में धकेलकर उन्हें असल मुद्दों (बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य) से भटकाने का प्रयास। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा इसे ‘अनैतिक’ मान रहा है, तब भी इसके संचालन पर सख्त प्रतिबंध न लगना तंत्र की मंशा पर गहरे सवाल खड़े करता है।
निष्कर्ष: अब जागना होगा
पुलिस प्रशासन को यह समझना होगा कि केवल ‘रजिस्टर चेक’ कर लेने से उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। यदि समय रहते इन ‘आधुनिक वैश्यालयों’ के खिलाफ कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई, तो हमारे समाज की नैतिक नींव को ढहने से कोई नहीं बचा पाएगा।
बस्ती मंडल समेत पूरे उत्तर प्रदेश में फैले इस जाल को उखाड़ने के लिए अब किसी ‘बड़े आदेश’ का इंतज़ार नहीं, बल्कि ‘इच्छाशक्ति’ की जरूरत है।


















