
रश्मी शर्मा ब्यूरो चीफ…..दिल्ली की एक किटी पार्टी का आधुनिकता से भरा एक विचित्र नज़ारा सामने आया। बताया जाता है कि संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की एक नियमित किटी पार्टी में लगभग *8 लाख रुपये की शराब* पी ली गई। नशे के हालत कुछ एसे थे की एक दुसरे के उपर शराब उड़ेलने लगी. स्थिति इतनी असामान्य हो गई कि होटल के काउंटर से उनके ड्राइवरों को बुलाना पड़ा और वे अपनी-अपनी “मेम साहब” को सहारा देकर वहाँ से घर ले गए।
आज हम *एआई, मोबाइल, आधुनिक शिक्षा और आत्मनिर्भरता* की बात करते हैं। पर एक प्रश्न उठता है—यदि जीवन बिताने के लिए हमें शराब जैसे सहारे की आवश्यकता पड़ जाए, तो उस जीवन की सार्थकता क्या रह जाती है?
सुख और दुःख जीवन के अभिन्न अंग हैं, किंतु उनके वास्तविक अर्थ को समझने से हम लगातार दूर होते जा रहे हैं। धन, प्रसिद्धि, करियर और सुविधाएँ होने के बावजूद जीवन के भीतर एक गहरा *खोखलापन* दिखाई देता है। दिन तो मोबाइल, व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों में निकल जाता है, लेकिन रात कैसे कटे—यह आज कई लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
*“मैं और मेरा जीवन” की संकीर्णता में हम परमात्मा द्वारा रची गई जीवन-व्यवस्था को ही भूलते जा रहे हैं। परिवार और समाज जीवन के मूल आधार हैं, परंतु आज इन्हीं का विघटन हमारे सामने एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है* ।
आज हिंदुत्व, सामाजिक समरसता और एकता की बातें की जाती हैं। सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि भी समाजों को जोड़ने की बात करते हैं, पर प्रश्न यह है कि *समाज एक कैसे होगा* ? जब हमारे बीच अनेक सामाजिक और कानूनी जटिलताएँ हमें एक-दूसरे से दूर करती जा रही हैं।
आज युवाओं के सामने *विवाह और उसके बाद उसका सफल निर्वाह* सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।लडके तो विवाह से ही डरने लगे है. वैश्य समाज, ब्राह्मण समाज, एससी-एसटी—सभी के बीच एकता की बातें तो होती हैं, पर व्यवहार में वह कैसे संभव हो—यह प्रश्न अनुत्तरित है।
आज विवाह के साथ ही दहेज प्रताड़ना, पॉक्सो जैसे अनेक कानूनों की आशंकाएँ भी खड़ी दिखाई देती हैं। परिणाम यह है कि कई युवाओं में विवाह के प्रति भय और संकोच बढ़ रहा है।
कभी प्रेम विवाह को सफल जीवन का आधार माना जाता था, पर आज वह मिथक भी टूटता दिखाई दे रहा है। वर्षों का प्रेम संबंध भी विवाह के बाद कुछ ही समय में बिखर जाता है।
मानव जीवन का मूल आधार *दाम्पत्य और परिवार* ही है। किंतु जब युवा दाम्पत्य के बंधन से ही डरने लगें, तो हमारी डिग्रियों और उपलब्धियों का महत्व भी अधूरा रह जाता है।
भरा-पूरा परिवार ही जीवन की वास्तविक शक्ति है। पर जब परिवार ही समाप्त होने लगें, तो यह समझ लेना चाहिए कि अंततः मनुष्य के पास *नशे और कृत्रिम सहारों* के अलावा बहुत कम विकल्प बचेंगे—चाहे हम कितनी ही एआई तकनीक क्यों न ले आएँ या मोबाइल की दुनिया में क्यों न डूब ज


















