
तलाकशुदा जज ने सरेआम गरीब फूल वाले पति को हाथ जोड़कर प्रणाम किया…सच जानकर पूरी मंडी सन्न रह गई”
शहर की सबसे बड़ी अदालत, जहाँ ऊँची दीवारें और काले कोट वाले वकील न्याय की दलीलें पेश करते हैं, वहाँ की सबसे सम्मानित हस्ती थीं—न्यायमूर्ति अनुराधा वर्मा। अनुराधा अपनी निष्पक्षता और कड़क फैसलों के लिए जानी जाती थीं। लेकिन उनके इस रसूख के पीछे एक ऐसा अतीत छिपा था, जिसे उन्होंने अपनी ‘इमेज’ बचाने के लिए बरसों पहले दफन कर दिया था।
आज से 10 साल पहले अनुराधा सिर्फ एक छात्रा थी और अविनाश उसका पति। अविनाश एक साधारण फूल बेचने वाला था। उसने अपनी रातों की नींद और दिन का चैन एक कर दिया ताकि अनुराधा अपनी कानून की पढ़ाई पूरी कर सके। जब अनुराधा रात भर पढ़ती, तो अविनाश उसके लिए चाय बनाता, उसकी किताबों को करीने से सजाता और हमेशा कहता, “अनु, तुम एक दिन बहुत बड़ी जज बनोगी।”
अनुराधा जज बन गई, लेकिन सफलता के साथ-साथ उसके मन में एक दरार भी आ गई। उसे अब अविनाश का ‘फूल वाला’ होना समाज में नीचा दिखाने जैसा लगने लगा। एक हाई-प्रोफाइल पार्टी में जब किसी ने पूछा, “मैडम, आपके पति क्या करते हैं?” तो अनुराधा की चुप्पी ने उस रिश्ते की मौत का फैसला सुना दिया। उसने अपनी साख के लिए अविनाश से तलाक ले लिया। अविनाश ने बिना किसी शिकायत के कागजों पर दस्तखत कर दिए और वापस अपनी फूलों की मंडी में लौट गया।
वक्त का पहिया घूमा। अनुराधा अब जिले की मुख्य न्यायाधीश बन चुकी थीं। एक दोपहर, सरकारी प्रोटोकॉल के तहत उन्हें शहर की पुरानी फूल मंडी के पास से गुजरना था। अचानक उनकी गाड़ी रुकी। सायरन की आवाज सुनकर मंडी में सन्नाटा छा गया। लोग कतार में खड़े हो गए, क्योंकि जिले की सबसे बड़ी जज गाड़ी से उतर रही थीं।
अनुराधा की नजर भीड़ से दूर एक कोने में गई, जहाँ अविनाश बैठा था। वही सादगी, वही शांत चेहरा। वह गुलाब के फूलों को उतनी ही कोमलता से सजा रहा था जैसे कभी अनुराधा के सपनों को सजाता था। अनुराधा के कदम अपने आप उसकी ओर बढ़ गए। अधिकारी और पुलिसकर्मी हैरान थे कि जज साहिबा एक मामूली फूल वाले के पास क्यों जा रही हैं।
अविनाश के सामने पहुँचकर अनुराधा रुकीं। उन्होंने अपनी गरिमा और पद का अहंकार किनारे रखा और सबके सामने हाथ जोड़कर कहा— “प्रणाम!”
पूरी मंडी सन्न रह गई। अविनाश घबरा गया, उसने कांपते हाथों से हाथ जोड़े और बोला, “मैडम, आप तो जज हैं, मेरे सामने क्यों झुक रही हैं?” अनुराधा की आँखों में आँसू थे, उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “अविनाश, मामूली काम होता है, इंसान नहीं। आज मैं इस कुर्सी पर हूँ, तो वो तुम्हारी उस मेहनत की बदौलत है जिसे मैंने ठुकरा दिया था।”


















