
रश्मी शर्मा ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट तलाक के बाद मैं किराया बचाने के लिए मां का पुराना हार बेचने गई, लेकिन सुनार ने कांपते हुए कहा, “बेटी, तुम्हें 20 साल से ढूंढा जा रहा है”
तलाक के बाद मैं किराया बचाने के लिए मां का पुराना हार बेचने गई, लेकिन सुनार ने कांपते हुए कहा, “बेटी, तुम्हें 20 साल से ढूंढा जा रहा है”
तलाक के कागज़ पर मेरी आख़िरी साइन सूख भी नहीं पाई थी कि मेरे पति ने मेरी पूरी ज़िंदगी अपने नाम की तरह फेसबुक पर पोस्ट कर दी।
मेरी गाड़ी, मेरा घर, मेरी मेहनत से बनी कंपनी, सबके सामने वह मुस्कुरा रहा था।
और मैं?
मेरे हाथ में टूटी स्क्रीन वाला फोन था, कंधे पर पुराना बैग और गले में मां का एक पुराना हार।
उस रात मेरे मकान मालिक ने कहा, “आरती जी, किराया नहीं आया तो 48 घंटे में कमरा खाली करना पड़ेगा।”
मैंने उसी हार को छुआ और पहली बार लगा कि मां की आख़िरी निशानी भी बेचनी पड़ेगी।
दिल्ली की सर्द शाम में मैं चांदनी चौक की एक पुरानी ज्वेलरी दुकान के बाहर खड़ी थी। दुकान इतनी पुरानी लग रही थी जैसे हर दीवार ने कई परिवारों के राज़ छुपा रखे हों। अंदर पीली रोशनी थी, लोहे की जाली थी और एक बूढ़ा सुनार, जिसकी आंखें तेज़ थीं लेकिन चेहरा थका हुआ।
मैंने हार काउंटर पर रख दिया।
“मुझे ज़्यादा नहीं चाहिए,” मैंने धीरे से कहा, “बस इतना मिल जाए कि 1 महीने का किराया दे सकूं।”
बूढ़े ने बिना उत्साह के हार उठाया। सोने की पतली चेन थी, बीच में छोटा सा माणिक जड़ा लॉकेट। मेरी मां मीरा देवी इसे हर दिन पहनती थीं। जब वह मरीं, मैंने उनके गले से यही उतारा था।
सुनार ने जैसे ही लॉकेट उलटकर देखा, उसकी उंगलियां जम गईं।
उसका चेहरा राख जैसा सफेद पड़ गया।
“यह तुम्हें कहां से मिला?” उसने फुसफुसाकर पूछा।
“मेरी मां का था।”
“तुम्हारी मां का नाम?”
“मीरा देवी शर्मा।”
वह पीछे लड़खड़ा गया। काउंटर से स्टूल टकराया और ज़मीन पर गिर पड़ा।
“बेटी…” उसकी आवाज़ कांप रही थी, “साहब तुम्हें 20 साल से ढूंढ रहे हैं।”
मेरी रीढ़ में ठंड उतर गई।
“कौन साहब?”
तभी दुकान के पीछे का लकड़ी का दरवाज़ा खुला।
एक लंबा, बूढ़ा आदमी बाहर आया। सफेद बाल, सीधी कमर, काले बंदगले में ऐसी रईसी थी जो चिल्लाती नहीं, बस कमरे को चुप करा देती है। उसकी नजर पहले हार पर गई, फिर मेरे चेहरे पर टिक गई।
उसकी आंखें भर आईं।
“नंदिनी?” उसने कहा।
मैं पीछे हट गई। नंदिनी मेरी मां का दूसरा नाम था, जिसे घर में सिर्फ नानी पुकारती थीं।
“आप कौन हैं?”
उसने दीवार पकड़ ली, जैसे 20 साल का दर्द अचानक उसके सीने पर गिर पड़ा हो।
“मैं तुम्हारा नाना हूं।”
मैं हंसना चाहती थी। भागना चाहती थी। चिल्लाना चाहती थी कि अब कोई नया धोखा मत दो। लेकिन उसी पल मेरा फोन कांपा।
राघव का मैसेज था: “गरीबी मुबारक हो। वापस रेंगते हुए मत आना।”
मैंने स्क्रीन देखी, फिर उस बूढ़े आदमी को।
उसने कांपते हाथों से कहा, “तुम्हारी मां तुम्हें लेकर इसलिए गायब हुई थी क्योंकि मेरे बेटे की हत्या के बाद तुम्हारी जान को खतरा था। मैंने सोचा था मैंने अपनी बेटी और नातिन दोनों खो दीं।”
मेरे कानों में खून दौड़ने लगा।
मां ने कभी अपने मायके की बात क्यों नहीं की?
अगर यह आदमी सच कह रहा था, तो मैं कौन थी?
और अगर झूठ बोल रहा था, तो उसे मेरी मां का छुपा नाम कैसे पता था?
तभी दुकान के बाहर काली गाड़ियों का काफिला रुका, और बूढ़े ने मेरी तरफ हाथ बढ़ाकर कहा, “आरती, अब सच सुनने का वक्त आ गया है।”
उस आदमी का नाम राजवीर मल्होत्रा था, और दिल्ली के बड़े-बड़े बिल्डर उसकी एक चुप्पी से रास्ता बदल देते थे। मैं उसके साउथ दिल्ली वाले ऑफिस में बैठी थी, सस्ते स्वेटर में सिकुड़ी हुई, जबकि सामने कांच की दीवारों के पार शहर चमक रहा था। उसने मेरे सामने एक फाइल रखी। “तुम्हारी मां ने तुम्हें बचाने के लिए गरीबी चुनी,” उसने कहा, “लेकिन
तुम्हारे नाम पर जो ट्रस्ट था, उसे कभी छुआ तक नहीं।” वकील ने कागज़ आगे सरकाए। “आरती मीरा मल्होत्रा, आप Lucia Family Trust की अकेली वारिस हैं। वर्तमान मूल्य लगभग 92 करोड़।” मेरी सांस अटक गई। “राघव ने सब छीन लिया,” मैंने कहा। राजवीर की आंखें पत्थर जैसी हो गईं। “तो हम जानेंगे उसने कैसे छीना।” मैंने पासवर्ड, तारीखें, कंपनी के खाते, नकली दस्तावेज़ और वो फाइलें बताईं जिन्हें राघव हमेशा
“औरतों की समझ से बाहर” कहता था। उसे याद नहीं रहा कि 5 साल तक उसकी कंपनी की असली हिसाब-किताब मैंने संभाली थी। 2 दिन बाद राघव का फोन आया। “सुना है तुम सवाल पूछ रही हो,” उसने हंसते हुए कहा। मैंने कॉल स्पीकर पर डाल दी। “मैं अपना वापस मांग रही हूं।” “तुम्हारा? तुमने सब साइन किया था।” “3 ट्रांसफर पर मेरी साइन नकली है।” कुछ पल चुप्पी रही। फिर उसकी आवाज़ धीमी और ज़हरीली हुई। “सावधान रहो, टूटी हुई औरतों पर कोई भरोसा नहीं करता।” पीछे से
उसकी नई प्रेमिका सिया हंसी। “उसे बोलो, वो हार भी नकली होगा।” राघव बोला, “शुक्रवार को लॉन्च पार्टी है, तुम्हारे पुराने घर में। आ जाना, गेट पर बचा खाना दिलवा दूंगा।” मैंने शांत स्वर में कहा, “दोबारा बोलो।” वह अकड़ गया। “घर मेरा, कंपनी मेरी, जज का गोल्फ दोस्त मेरा। तुम्हारे पास क्या है? टूटा फोन?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “हां, और यह बहुत साफ रिकॉर्ड करता है।” शुक्रवार रात मैं उसी घर के गेट पर खड़ी थी, काली साड़ी में। राघव मेहमानों के बीच हंसा, “देखो कौन भीख मांगने आई है।” तभी मेरे पीछे काली गाड़ी रुकी। राजवीर मल्होत्रा उतरे। पूरा लॉन शांत हो गया। उन्होंने सबके सामने मेरा हाथ थामा और कहा, “मेरी नातिन, अंदर चलें?” राघव का चेहरा पहली बार सचमुच टूट गया।



















