
संदीप सबरवल ब्यूरो चीफ की स्पेशल रिपोर्ट
योग दिवस पर ओशो संदेश
ये जिनको तुम योगी समझते हो ,
ये सब सरकसों में भर्ती करने योग्य है ।
इनका कोई भी मूल्य नहीं ।
अच्छा है , शरीर के स्वास्थ के लिए ठीक है , पर इससे
कुछ परमात्मा के मिलने का लेना-देना नहीं है ।
परमात्मा से कौन मिलता है ।
जो स्वस्थ है । जो स्वयं में स्थित है ।
जो वर्तमान में आरूढ़ है ।
क्योंकि परमात्मा का द्वार वर्तमान है ।
अतीत है नहीं अब , न हो चुका ; भविष्य अभी आया नहीं ,
वह भी नहीं है । है क्या ? यह क्षण !
इस क्षण से ही तुम प्रवेश करो तो परमात्मा में पहुंच सकते हो ।
क्योंकि यही क्षण वास्तविक है , अस्तित्ववान है ।
और परमात्मा है महाअस्तित्व ।
इसी क्षण के द्वार से सरको और परमात्मा में पहुंच जाओगे ।
ध्यान की सारी प्रक्रियाएं इसी क्षण में उतर जाने की प्रक्रियाएं हैं
जब चित्त में कोई विचार नहीं होता , तो स्वभावतः समय मिट
जाता है । क्योंकि विचार या तो अतीत के होते हैं या भविष्य के
होते हैं । वर्तमान का तो विचार कभी होता ही नहीं ।
तुम करना भी चाहो तो न कर सकोगे ; बैठ कर कोशिश करना ।
वर्तमान का कोई विचार संभव नहीं है ; वह असंभावना है ।
तुम जब भी विचार करोगे तो अतीत का होगा ।
यह भी हो सकता है कि सामने गुलाब का फूल खिला है
और जैसे ही तुमने कहा , ‘ अहा ‘ कितना सुंदर फूल ! ‘
यह अतीत हो गया । यह तुम्हारी जो प्रतीति हुई थी सौंदर्य की ,
उसकी स्मृति है अब । यह अतीत हो गया , यह अब वर्तमान न
रहा । तुम बोले कि अतीत में गये , या भविष्य में गये ।
विचार उठा , कि अतीत या भविष्य ।
तुम डोल गये दायें या बायें , मध्य खो गया ।
मध्य तो निर्विचार में होता है ।
ध्यान का अर्थ होता है : चुप , मौन , कोई विचार नहीं उठता ,
कोई विचार की तरंग नहीं उठती , झील शांत है …… ।
यह शांत झील वर्तमान से जोड़ देती है ।
और जो वर्तमान से जुडा़ , वही योगी है ।
ध्यानी योगी है । और जो वर्तमान से जुड़ गया ,
वह परमात्मा से जुड़ गया ; क्योंकि वर्तमान परमात्मा का द्वार है ।
अगर तुम्हारा जीवन सहज हो जाये
तो बस ठहर गए , आसन लग गया । यही असली आसन है ।
पालथी मारकर और सिद्धासन लगाना असली आसन नहीं है ।
वह तो कोई भी लगा ले । वह तो कवायद है ।
व्यायाम है , अच्छा है ; करो तो शरीर के लिए स्वास्थ्य कर है ;
लेकिन उससे कोई आत्मा नहीं मिल जायेगी ।
सहजता में , निजता में जो आसन लग जाता है ,
तो आत्मा का अनुभव शुरू होता है ।
( सतगुर मिलै त ऊबरै – प्रवचन 3 एवं प्रवचन 1 से संकलन )
– 9 अक्टूबर एवं 11 नवंबर 1978 – पूना
लेकिन योगासन से भी मिलता है , उससे भी लोगों ने पाया है —
इसका इनकार नहीं है । मैं तुमसे कहता हूं , लाख तुम –
योगासन करो , नहीं पाओगे । हां , कुछ और पाओगे ।
स्वास्थ्य पाओगे । कम बीमार होओगे । ज्यादा लंबे जीओगे ।
मगर ज्यादा लंबे जीकर भी क्या करोगे ?
जीओगे तो यही जीवन , यही गलत जीवन ।
यह तो कम ही जीना अच्छा है ।
इसको लंबा जीकर और गलतियां बढा़ओगे ।
स्वस्थ रहोगे माना , मगर स्वस्थ रह कर करोगे क्या ?
और शराब पीओगे । और जुआ खेलोगे ।
और वेश्यागमन करोगे । और करोगे क्या ?
योगासन तुम्हें स्वास्थ्य दे सकता है , लंबी आयु दे सकता है ,
इसमें कोई दो मत नहीं हैं । क्योंकि सुंदर व्यायाम है ;
मगर व्यायाम शरीर के पार नहीं जाता ।
शरीर को मोडो़-मरोडो़ , ऐसा झुकाओ , वैसा झुकाओ ।
स्वभावतः शरीर लोचपूर्ण रहेगा , ज्यादा दिन तक युवा रहेगा ।
मगर युवा होने का करोगे क्या ?
कुछ न कुछ गलत ही तो करोगे ।
ठीक करने की दृष्टि कहां से आ जाएगी ?
क्या तुम सोचते हो योगासन करने से सम्यक दृष्टि का जन्म होगा ?
वह संभव नहीं है ।
और भारत योगासन के नाम पर खूब भटक गया है ,
खूब भरमाया हुआ है । कोई नाक पर एक अंगुली लगाए हुए
सांसें ले रहा है , कोई सिर के बल खडा़ हुआ है ।
कोई यह बंध साध रहा है , कोई वह बंध साध रहा है ,
और जिंदगी उनकी इसी में बीत रही है –बंधों के साधने में ।
और मुक्ति कब साधोगे ? ये बंध ही बंध साधते रहोगे !
यह देह तो चली जाएगी ।
फिर चाहे योगासन से पुष्ट हुई हो , चाहे दंड-बैठक से पुष्ट हुई हो
और चाहे पाश्चात्य ढंग के व्यायाम से पुष्ट हुई हो ,
यह देह तो चली जाएगी ।
इस देह के साथ सब योगासन भी चला जाएगा ।
कुछ साधो जो मौत के पार तुम्हारे साथ चलेगा !
और किसी तरह से तुम सुख न पाओगे ।
और सब तरह से दुख पाओगे । लाख करो उपाय , सुख न होगा ।
उपाय से सुख का कोई संबंध ही नहीं ।
आसन लगाओ , व्यायाम करो , प्राणायाम साधो ,
शीर्षासन , सर्वांगासन , मयूरासन , और कितने आसन हैं ,
करते रहो ; शरीर को इधर हिलाओ उधर डुलाओ ,
दंड-बैठक लगाओ , लगाते रहो — कुछ भी न होगा ।
उपवास करो , भूखे मरो , दूसरों को भूखा मारो ,
कुछ भी नहीं होगा । शरीर को गलाओ , सडा़ओ — धूप में ,
सर्दी में —- कुछ भी न होगा ।
उपाय से कुछ भी नहीं होने वाला ।
हां , ध्यान से कुछ होगा । और ध्यान उपाय नहीं है ।
ध्यान है शून्य अवस्था , निष्प्रयत्न की अवस्था ,
अक्रिय अवस्था , जहां सब क्रिया समाप्त हो जाती है ।
और उसी ध्यान की अवस्था में अपने से पहचान होती है ।
जब तुम बिलकुल मौन हो , कुछ भी नहीं कर रहे हो ,
करना छूट गया बहुत दूर , न करने की अवस्था में आ गए हो ,
तभी , तत्क्षण जगत के सत्य से तुम्हारा सत्य मेल खा जाएगा ।
संगीत बज उठेगा !
पैरों में पायल बंध जाएंगी !
घूंघर छनक उठेंगे !
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