
सुशील शंकर विग एडिटर इन चीफ की रिपोर्ट
कल न्यायालय में पेशी के दौरान गिरफ्तार अभियुक्त गिरी वाला सिंह जो की एक पूर्व जिला जज थी ने इस बात की आपत्ति की न्यायालय में उनके नाम के आगे श्रीमती क्यों नहीं लगाया गया.
प्रश्न यह है कि गिरफ्तार हो चुकी एक पूर्व जिला न्यायाधीश (Retired District Judge) यह आपत्ति कर सकती हैं कि उनके नाम के आगे “श्रीमती” नहीं लगाया गया, तो इसका उत्तर भावनात्मक नहीं बल्कि विधिक सिद्धांतों के आधार पर दिया जाना चाहिए।
1. गिरफ्तारी से व्यक्ति की विधिक पहचान समाप्त नहीं होती
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 गिरफ्तारी के बाद भी व्यक्ति की गरिमा (Dignity) की रक्षा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने D.K. Basu v. State of West Bengal तथा Joginder Kumar v. State of Uttar Pradesh में कहा है कि गिरफ्तार व्यक्ति भी अपने मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा से वंचित नहीं होता।
इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने नाम, पहचान या संबोधन की शुद्धता पर आपत्ति करता है तो केवल गिरफ्तारी के कारण उसका यह अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।
2. क्या कानून में “श्री”, “श्रीमती”, “सुश्री” लिखना अनिवार्य है?
उत्तर है—नहीं।
न तो BNSS, न ही सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) और न ही आपराधिक न्यायालयों के सामान्य नियम यह अनिवार्य करते हैं कि अभियुक्त के नाम के आगे “श्री”, “श्रीमती” या “सुश्री” लिखा ही जाए।
अदालत का उद्देश्य व्यक्ति की सही पहचान (Identity) सुनिश्चित करना है, न कि सम्मानसूचक उपाधि देना।
यदि आदेश में “Giribala Singh” लिखा है और पहचान स्पष्ट है, तो केवल “Smt.” न लिखने से आदेश अवैध नहीं हो जाता।
3. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि न्यायिक कार्यवाही में Substance Prevails Over Form अर्थात वास्तविक विषयवस्तु औपचारिक त्रुटियों से अधिक महत्वपूर्ण है।
यदि नाम की वर्तनी गलत हो, व्यक्ति की पहचान गलत हो, पिता/पति का नाम गलत हो, तो वह महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन केवल सम्मानसूचक शब्द का अभाव सामान्यतः कार्यवाही को प्रभावित नहीं करता।
4. न्यायाधीश होने के कारण क्या विशेष अधिकार?
गिरिबाला सिंह एक सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश हैं। न्यायिक पद पर रहने के दौरान उन्हें संस्थागत सम्मान प्राप्त था। लेकिन गिरफ्तारी और अभियोजन के बाद वे एक अभियुक्त (Accused) के रूप में न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने Delhi Judicial Service Association v. State of Gujarat में न्यायिक अधिकारियों की गरिमा की रक्षा के लिए दिशानिर्देश दिए थे, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा कि गिरफ्तारी के बाद उनके नाम के आगे विशेष सम्मानसूचक शब्द लिखना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।
5. यदि वास्तव में उन्होंने यह आपत्ति उठाई हो तो उसका विधिक मूल्य क्या होगा?
विधिक दृष्टि से यह अधिकतम एक औपचारिक (Formal) आपत्ति मानी जाएगी।
यह:
गिरफ्तारी को अवैध नहीं बनाती,
रिमांड आदेश को प्रभावित नहीं करती,
न्यायिक हिरासत को निरस्त नहीं करती,
अभियोजन को कमजोर नहीं करती।
अधिक से अधिक अदालत रिकॉर्ड में सुधार कर सकती है यदि उसे उचित लगे।
गिरफ्तार व्यक्ति, चाहे वह पूर्व जिला न्यायाधीश ही क्यों न हो, अपने नाम या संबोधन के सही उल्लेख पर आपत्ति उठा सकता है। लेकिन भारतीय कानून में अभियुक्त के नाम के आगे “श्रीमती” लिखना कोई अनिवार्य विधिक आवश्यकता नहीं है। इसलिए ऐसी आपत्ति व्यक्तिगत गरिमा या शिष्टाचार के स्तर पर समझी जा सकती है, परंतु इसका कोई विशेष विधिक प्रभाव नहीं पड़ता और न ही इससे गिरफ्तारी, रिमांड या न्यायिक कार्यवाही की वैधता प्रभावित होती है।
जहाँ तक उपलब्ध समाचारों का प्रश्न है, गिरिबाला सिंह को ट्विशा शर्मा प्रकरण में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेजा गया है और उन्होंने अदालत के समक्ष सुरक्षा, मीडिया ट्रायल तथा जांच से संबंधित कई शिकायतें भी उठाई थीं जो कि उनका अधिकार है…!



















