
सुष्मा ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट —”चाहे कुछ भी हो जाए, अब इस कमरे का दरवाज़ा किसी के लिए नहीं खोला जाएगा।”दोनों ने हँसते हुए ये शर्त स्वीकार कर ली।कुछ देर बाद अचानक पति के माता-पिता मिलने आ पहुँचे। उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी।पति ने दरवाज़े की ओर देखा, दिल काँप उठा… पर फिर उसे शर्त याद आ गई।उसने दरवाज़ा नहीं खोला।माँ-बाप भारी मन से, मायूस होकर लौट गए।कुछ देर बाद पत्नी के माता-पिता आए और उन्होंने भी दरवाज़ा खटखटाया।पत्नी ने अपने पति की तरफ देखा… और उसकी आँखों में आँसू आ गए।भावनाओं में डूबी हुई वह बोली:”मैं ये अपने माता-पिता के साथ नहीं कर सकती।”और उसने दरवाज़ा खोल दिया।पति ने यह सब चुपचाप देखा… लेकिन कुछ नहीं कहा।समय बीत गया…उनके दो बेटे हुए। उनके जन्म पर सामान्य ख़ुशी मनाई गई।फिर एक दिन उनके घर एक बेटी का जन्म हुआ।पति ने बेटी के आने पर बहुत धूमधाम से जश्न मनाया —सभी रिश्तेदारों और दोस्तों को आमंत्रित किया।पत्नी यह देखकर हैरान रह गई।वो पूछ बैठी:”जब बेटों के जन्म पर इतना कुछ नहीं किया,तो फिर बेटी के जन्म पर इतना बड़ा उत्सव क्यों?”पति ने मुस्कुराते हुए, प्यार से जवाब दिया:”क्योंकि मुझे पता है…एक दिन यही बेटी मेरे लिए दरवाज़ा ज़रूर खोलेगी।”पति की ये बात सुनकर पत्नी की आँखें नम हो गईं।उसे पहली बार एहसास हुआ कि बेटियाँ कितनी खास होती हैं।भले ही वो कुछ समय के लिए माता-पिता के घर में रहती हैं,लेकिन उनका दिल, उनकी ममता


















