
रश्मी शर्मा ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट सच ही कहा गया है कि बेटी माता-पिता की जान होती है। बेटी केवल एक संतान नहीं होती, बल्कि वह प्रेम, संवेदना और संस्कारों की वह डोर होती है जो दो घरों को ही नहीं, कई परिवारों को जोड़कर रखती है। बेटी का हृदय बहुत विशाल होता है। उसमें मायके का स्नेह भी होता है और ससुराल की जिम्मेदारियाँ भी। वह अपने जीवन में जितने रिश्तों को निभाती है, उतने शायद ही कोई और निभा पाता है।
जब बेटी अपने माता-पिता के घर में होती है तो वह घर की रौनक होती है। उसकी हँसी से आँगन खिल उठता है, उसकी बातों से घर में अपनापन झलकता है। माता-पिता की छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखना, भाई-बहनों के साथ स्नेह और प्यार का वातावरण बनाना, यह सब उसके स्वभाव में ही होता है। माता-पिता के लिए बेटी केवल संतान नहीं होती, बल्कि उनके जीवन का गर्व और सहारा होती है।
समय के साथ वही बेटी विवाह के बाद एक नए घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेती है। वह एक नए परिवार में प्रवेश करती है, जहाँ उसे सास-ससुर, देवर-ननद, पति और अनेक रिश्तों को अपनाना होता है। धीरे-धीरे वह उस घर की बहू बनकर केवल घर की सदस्य ही नहीं रहती, बल्कि उस परिवार को जोड़कर रखने वाली शक्ति बन जाती है। सास-ससुर की सेवा, परिवार की मर्यादा का ध्यान, पति का साथ और पूरे घर में प्रेम का वातावरण बनाए रखना — यह सब वह बड़ी सहजता और धैर्य के साथ निभाती है।
नारी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह रिश्तों को जोड़ने की अद्भुत क्षमता रखती है। वह टूटते हुए रिश्तों को संभालने का प्रयास करती है, नाराज लोगों को मनाने का प्रयास करती है और परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने की कोशिश करती है। कई बार जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं जब माता-पिता और बेटे-बहू के बीच किसी बात को लेकर मतभेद हो जाता है। ऐसे समय में अक्सर बेटी ही वह व्यक्ति बन जाती है जिस पर सबकी आशाएँ टिक जाती हैं।
वह अपने मायके के माता-पिता के दुख को भी समझती है और अपने भाई-भाभी की परिस्थितियों को भी समझने का प्रयास करती है। वह कभी भाई को समझाती है, कभी माता-पिता को धैर्य रखने को कहती है। कई बार इस बीच उसका मन भी बहुत व्यथित हो जाता है। कई बेटियों के मुख से यह शब्द निकलते हैं
“पापा, मम्मी… मैं थक गई हूँ। किसे-किसे समझाऊँ? कभी छोटे को समझाना पड़ता है, कभी अपने से बड़े को।”
यह वाक्य केवल एक बेटी की थकान नहीं, बल्कि उसके भीतर के त्याग, प्रेम और जिम्मेदारी की गहराई को दर्शाता है। वह स्वयं दुखी होते हुए भी परिवार को टूटने नहीं देना चाहती। यही नारी की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह अपने दर्द को छिपाकर भी दूसरों के लिए मुस्कुराती रहती है।
नारी के जीवन में अनेक रूप होते हैं। वह कभी बेटी बनकर माता-पिता के जीवन में खुशियाँ लाती है, कभी बहू बनकर नए घर की मर्यादा और संस्कारों को संभालती है, कभी पत्नी बनकर जीवनसाथी का संबल बनती है, और फिर समय आने पर माँ बनकर नई पीढ़ी का निर्माण करती है। आगे चलकर वही नारी दादी और नानी बनकर परिवार को अनुभव और स्नेह का आशीर्वाद देती है।
यदि हम समाज की नींव को देखें तो पाएँगे कि उस नींव में सबसे बड़ा योगदान नारी का ही है। उसका धैर्य, त्याग, सहनशीलता और ममता परिवारों को टूटने से बचाती है। वह अपने स्नेह और संवेदना से रिश्तों को जोड़ती है और समाज को संस्कारों से भरती है।
इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि नारी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सृजन की शक्ति है। वह परिवार की आत्मा है, समाज की आधारशिला है और मानवता की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।
जिस घर में बेटी का सम्मान होता है, उस घर में सुख, शांति औ समृद्धि का वास होता है। और जिस समाज में नारी का सम्मान होता है, वह समाज सदैव उन्नति और संस्कृति की ओर अग्रसर रहता है।
इसीलिए हमें यह याद रखना चाहिए कि बेटी और नारी केवल परिवार का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि वही परिवार की असली शक्ति और आधार होती हैं।
लेख का आशय और हम सब का कर्तव्य है कि हम सब बेटी रूपी अनमोल धरोहर अनमोल सृजन करने वाली इस महान आत्मा इस शक्ति को अनमोल बना रहने दे। आज की आधुनिकता की होड़ में आधुनिक शिक्षा ,शिक्षा लेने का परिवेश,पहनावा,उनकी भाषा,उनके विचार,उनके व्यक्तित्व से नारी के गुणों का ह्रास हो रहा है जिससे परिवार टूट और बिखर रहे है। आज नारी की अस्मिता डगमगा रही है हम सब का कर्तव्य है कि नारी को नींव की ईंट बनी रहने के लिए उसे उच्च शिक्षा के साथ परिवार और रिश्तों के संस्कार हम देते रहे ।
अगर बेटी या नारी सुंदर होगी तो हमारा घर हमारा समाज हमारे अपने हमारे बने रहेंगे अन्यथा समाज रिश्ते परिवार उखड़ जाएंगे और मानव पृथ्वी पर कमजोर बन अपने को कोसता रहेगा।


















