
संकट मोचन का साथ
रमपुर नाम के एक छोटे से कस्बे में आर्यन और वीर नाम के दो दोस्त रहते थे। दोनों ही हनुमान जी के पक्के भक्त थे, लेकिन दोनों की भक्ति का अंदाज अलग था। वीर कहता, “हनुमान जी शक्ति के देवता हैं, इसलिए मैं शरीर बना रहा हूँ।” वहीं आर्यन कहता, “हनुमान जी बुद्धि और सेवा के भी प्रतीक हैं, मैं उनके जैसा धैर्य सीखना चाहता हूँ।”
एक बार उनके शहर में भारी बारिश और बाढ़ आ गई। गाँव का पुराना पुल टूट गया और शहर का संपर्क कट गया। राशन की कमी होने लगी। प्रशासन की मदद पहुँचने में समय था।
वीर जोश में आकर बोला, “मैं अकेले ही नदी पार करके रसद (राशन) ले आऊंगा, मुझे मेरी ताकत पर भरोसा है।” लेकिन पानी का बहाव इतना तेज था कि वीर बीच में ही घबरा गया और उसके पैर डगमगाने लगे। उसका अहंकार उसे डरा रहा था।
तभी आर्यन वहाँ पहुँचा। उसने शोर मचाने या डरने के बजाय शांत मन से हनुमान चालीसा का पाठ किया और दिमाग लगाया। उसने गाँव के कुछ और युवकों को इकट्ठा किया, मज़बूत रस्सियों का जुगाड़ किया और ‘ह्यूमन चेन’ (मानव श्रृंखला) बनाई।
आर्यन ने वीर का हाथ पकड़कर कहा, “वीर, हाथ मज़बूत रख! हनुमान जी सिर्फ गदा नहीं उठाते, उन्होंने तो पूरी वानर सेना को साथ लेकर समुद्र पार किया था। संगठन में ही शक्ति है।”
हनुमान जी का नाम लेकर सबने मिलकर काम किया और सुरक्षित तरीके से शहर तक रसद पहुँचाई। उस दिन वीर को समझ आया कि असली भक्त वह है जो अपनी शक्ति का प्रयोग सही समय पर, धैर्य और बुद्धि के साथ करे।
*शिक्षा*
भक्ति केवल दिखाने में नहीं, बल्कि हनुमान जी की तरह ‘बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार’ भाव से सेवा करने में है। जब शक्ति के साथ बुद्धि और धैर्य जुड़ता है, तभी सफलता मिलती है।


















