
सुशील शंकर विग एडिटर इन चीफकी रिपोर्ट
आलोचना का अधिकार है, गाली का नहीं – PM के लिए ऐसी भाषा कहाँ तक सही?
वीडियो देखिए। एक लड़की हाथ में पोस्टर लेकर खड़ी है। पोस्टर पर प्रधानमंत्री के लिए बेहद अभद्र और गाली भरी भाषा लिखी है।
साथ में कुछ और लोग खड़े हैं जो दूसरे पोस्टर लिए हुए हैं।
अब सवाल ये है –
आप प्रधानमंत्री से असहमत हो सकते हैं। आप उनकी नीतियों की आलोचना कर सकते हैं, आप राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ नारे लगा सकते हैं, ये आपका लोकतांत्रिक अधिकार है। भारत में सबको ये हक है।
लेकिन क्या लोकतंत्र के नाम पर देश के मौजूदा प्रधानमंत्री के लिए इतनी घटिया और अपशब्द वाली भाषा का इस्तेमाल करना सही है?
ये विरोध-प्रदर्शन है या सिर्फ गाली-गलौज से ध्यान खींचने की कोशिश?
सोचिए, अगर यही भाषा किसी और के लिए इस्तेमाल होती तो क्या हम इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी कहते? ये फेमिनिज्म नहीं है, ये सिर्फ बदतमीज़ी है।
फेमिनिज्म का मतलब बराबरी की बात करना है, गाली देकर खुद को बड़ा दिखाना नहीं। ऐसी भाषा से आप अपने ही आंदोलन को कमजोर करते हो। लोग आपकी बात नहीं, आपकी भाषा याद रखते हैं।
क्या ऐसी भाषा इस्तेमाल करने वालों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? कानून सबके लिए बराबर है। अगर कोई आम आदमी के लिए ऐसी गाली लिखे तो FIR होती है, तो प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद के लिए ऐसी भाषा पर क्या सज़ा होनी चाहिए?
आपकी क्या राय है? आलोचना होनी चाहिए या गाली? कमेंट में बताओ।
इस वीडियो को शेयर करो ताकि लोगों को पता चले कि विरोध के नाम पर क्या परोसा जा रहा है।



















