
कमानी ब्यूरो चीफ की कलम से
बंगाल की राजनीति में एक नोटिस ने बुआ-भतीजे की नींद उड़ा दी—और फिर अपने ही खेमे से ऐसी पोल खुली कि पूरा खेला पलटता दिखने लगा।
जिस CID नोटिस को सिर्फ “राजनीतिक बदला” बताया जा रहा था, उसी के पीछे जब अपने ही विधायकों का नाम सामने आया, तो बंगाल की सत्ता के गलियारों में सन्नाटा छा गया। अभिषेक बनर्जी की पूछताछ, 15 दिन की मोहलत की मांग, और फिर शाम को घर तक पहुंची टीम—इन सबने सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अब बचने के सारे रास्ते बंद हो रहे हैं?
कहानी की शुरुआत होती है उस दिन से, जब अभिषेक बनर्जी को CID मुख्यालय में पेश होना था। दावा था कि उनकी तबीयत खराब है, वकील के जरिए समय मांगा गया, लेकिन CID ने मामला हल्का नहीं लिया। शाम को टीम सीधे उनके घर पहुंची और नया नोटिस थमा दिया। बाहर समर्थकों की बेचैनी थी, अंदर सियासी दबाव बढ़ता जा रहा था, और हर कदम रिकॉर्ड पर लिया जा रहा था।
इसी बीच शुभेंदु अधिकारी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने पूरे मामले को और विस्फोटक बना दिया। उन्होंने दावा किया कि यह जांच भाजपा की तरफ से नहीं, बल्कि तृणमूल के ही दो विधायकों की शिकायत के बाद शुरू हुई है। आरोप था कि पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ताक पर रखकर दस्तावेजों और हस्ताक्षरों में बड़ा खेल किया गया। जैसे ही यह बात सामने आई, तृणमूल के भीतर की बेचैनी खुलकर दिखने लगी।
सबसे चौंकाने वाली बात तब हुई, जब ममता बनर्जी की बुलाई बैठक में कथित तौर पर ज्यादातर विधायक पहुंचे ही नहीं। जो पार्टी कभी पूरे बंगाल में अजेय दिखाई देती थी, उसके अंदर ही अब खामोश बगावत की आहट सुनाई देने लगी। सवाल उठने लगा—क्या यह सिर्फ CID जांच है, या तृणमूल के अंदर से ही शुरू हुआ बड़ा सत्ता परिवर्तन?
और इसी बीच भाजपा सरकार ने महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और नए मंत्रिमंडल विस्तार जैसे फैसलों से अपनी नई छवि गढ़नी शुरू कर दी। लेकिन असली सवाल अभी बाकी है—क्या यह तूफान सिर्फ शुरुआत है?



















