April 19, 2026 7:59 pm

यूपी के सबसे साफ और सुरक्षित शहरों में एक नोएडा की समृद्धि की रीढ़ माने जाने वाले मजदूर और कर्मचारियों के सीने में दबी.

अतुल ब्यूरो चीफ की कलम से यूपी के सबसे साफ और सुरक्षित शहरों में एक नोएडा की समृद्धि की रीढ़ माने जाने वाले मजदूर और कर्मचारियों के सीने में दबी आक्रोश की चिंगारी, ज्वाला बनकर फूटी तो यहां के बाशिंदे सन्न रह गए.

सड़के जाम करके हंगामा करने वाले अल्पवेतन भोगी मजदूर/कर्मचारी हैं. जिनकी पीड़ा अगर जान लेंगे, तो आपको नींद नहीं आएगी. यूं तो मजदूर हितों का ध्यान रखने वाले कानून आजादी के बाद ही लागू हो गए थे.

कर्मचारी राज्य बीमा निगम यानी (ईएसआईसी) ESIC एक्ट 1948, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) EPFO एक्ट 1952 और लेबर लॉ जैसे कानून मजदूर वर्ग के हितों का ध्यान रखने के लिए बनाए गए थे. फिर ऐसा क्या हुआ तो प्रवासी-मजदूरों का एक बड़ा वर्ग अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरा तो पथराव और आगजनी तक पहुंच गया.

मजदूरों का दर्द

जो लोग बीते कुछ दिनों से सड़कों पर उतरे हैं, उनके पास नौकरी है, उन्हें दिहाड़ी मजदूरों से ज्यादा वेतन मिलता है. कहने को तो उनके एम्प्लायर कर्मचारियों के लिए ओवरटाइम (समय से ज्यादा काम करने पर मिलने वाला भुगतान) जैसी सुविधाएं देते हैं. कई जतन करने के बावजूद उनके हाथ लगने वाला अमाउंट इतना नहीं हो पाता कि कमरतोड़ महंगाई और ब्लैक मार्केट में सिलेंडर की आसमान छूती कीमतों के बीच वो बिना कर्ज लिए अपने घर का चूल्हा जलाकर बीबी-बच्चों का पेट पाल सकें.

सुबह 07 बजे से लेकर 9 बजे तक मजदूरों का रेला

यूं तो नोएडा के कई इलाकों जैसे सेक्टर 57, 58, 59, 60, 62, 83, भंगेल और ग्रेटर नोएडा जैसे अनगिनत इलाके हैं, जहां सुबह 7 बजे से लेकर 9 बजे तक सड़कों पर केवल मुंड ही मुंड नजर आते हैं. लोग लंबी-लंबी कतारों में खोड़ा (यमुना पुश्ता) चाहे वो दिल्ली के नजदीक हाईवे के दायरे में आने वाला हो या गाजियाबाद की ठेठ खोड़ा कॉलोनी में रहने वाले लोग फैक्ट्रियों/कंपनी में काम करने के लिए तेज कदमों में भागते नजर आते हैं. मैं खुद साल 2003 से नोएडा के सेक्टर 56 में रहते हुए, उनकी जीवन यात्रा में आने वाली मुश्किलों का गवाह रहा हूं.

खासकर खोड़ा कॉलोनी में रहने वाले लोगों से जब भी कभी चर्चा छिड़ी तो एक चीज कॉमन निकलकर आई कि रूखी-सूखी रोटी खाकर परिवार पाल रहे हैं. अपवाद को छोड़कर सभी की सैलरी 10 हजार से 12 हजार रुपये महीने के बीच ही रही. कई जगहों पर 12-12 घंटे काम कराए जाने की बात पता चली. ईएसआई या ईपीएफ के इंस्पेक्टर जब औचक निरीक्षण या जांच के लिए जाते होंगे तो उन्हें भी वहां अनियमितता लगभग न के बराबर मिलती होगी, क्योंकि हर कंपनी/फैक्ट्री के मालिक और मैनेजर सरकारी कागजों को एकदम दुरुस्त रखते हैं.

खोड़ा, बरौला, छिजारसी, अग्गापुर, हरौला और भंगेल या किसी और इलाके में रहने वाले कर्मचारियों का हाल लगभग एक जैसा है.

नोएडा के लाखों प्रवासियों का दर्द चार शब्दों में यूं समझा जा सकता है. इनमें एक तबका ग्रेजुएट लोगों का है. जो पढ़ा-लिखा होने के बावजूद कम सैलरी में काम करने को मजबूर है.

आमदनी अठन्नी- खर्चा 10 रुपैया!

कुछ मजदूरों ने बताया कि उनकी फैक्ट्री में अलग-अलग सैलरी स्ट्रक्चर है. 10 से 14 हजार रुपये महीना.

खर्च- एक रूम (कॉमन बाथरूम जैसा मुंबई की चॉल वगैरह में होता है) का किराया 3 से 6 हजार रुपये. राशन-दूध और सब्जी 4 से 6 हजार रुपये. बिजली का बिल 300-600 रुपये. सिलेंडर (सरकारी रेट 855 रुपये के आसपास और ब्लैक में तीन हजार से चार हजार रुपये), बच्चों की फीस कॉपी-किताब-पेन-पेंसिल 1000 से 2000 रुपये, सैलरी खत्म.

इसके बाद घर में कोई बीमार पड़ जाए तो दवा लाने के लिए उसे कर्ज लेना पड़ता है. ये लोग नोएडा का 1200 टीडीएस वाला पानी पीकर बीमार होने से बचने के लिए कम से कम 600 रुपया महीना फिल्टर वाला पानी पीने के लिए खर्च करने को मजबूर हैं.

किस्मत अच्छी रहे और तबीयत खराब न हो, अगर मोहल्ले में कोई पूजा या कथा हो तो वहां भगवान को एक दर्जन केला चढ़ाने के पैसे भी नहीं होते.

यही वजह कि स्किल्ड और नॉन स्किल्ड हर वर्ग के कर्मचारी अपना वेतन कम से कम 20 हजार रुपये महीना करने की मांग कर रहे हैं, ताकि भले ही चार पैसे भविष्य के लिए न जोड़ सकें लेकिन बिना किसी के आगे हाथ फैलाए सम्मान के साथ जिंदा रह सकें.

इनका कहना है कि हरियाणा ने कर्मचारियों के वेतन में इजाफा किया है. ज्यादा सुविधाएं दी हैं, तो नोएडा में ऐसा भेदभाव क्यों हो रहा है?

नोएडा-ग्रेटर नोएडा की गारमेंट फैक्ट्रियों में कार्यरत कर्मचारी हरियाणा के नवीनतम मजदूरी दरों (15,220 रुपए-18,500+ रुपए) के अनुसार वेतन मांग रहे हैं, इस बीच उग्र प्रदर्शन के देखते हुए डीएम मेधा रूपम लगातार कर्मचारियों से शांत रहने और उनकी मांगे पूरी करने का आश्वासन दे रही हैं.

नोएडा की डीएम का वीडियो संदेश

नोएडा की डीएम बीते कुछ दिनों से वीडियो संदेश जारी करके मजदूरों और श्रमिकों की मांगों पर उचित एक्शन लेने की बात कह रही थीं, फिर भला कहां चूक हो गई कि हिंसा के बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.

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