
वीना विग एडिटर जयपुर की कलम से गाँव के सरकारी स्कूल में हर रोज़ की तरह सुबह की प्रार्थना चल रही थी। बच्चे कतार में खड़े थे—किसी की शर्ट धुली हुई थी, तो किसी की पर पुराना दाग अब भी दिख रहा था। उन्हीं कतारों में खड़ा था रवि, दुबला-पतला सा लड़का, जिसकी आँखों में नींद और पेट में भूख साफ झलक रही थी।
रवि आज भी बिना नाश्ता किए स्कूल आया था। उसकी माँ सुबह-सुबह खेत पर चली जाती थी और घर में इतना अनाज नहीं होता था कि हर दिन पेट भर नाश्ता बन सके। कई बार तो वह सिर्फ पानी पीकर ही स्कूल पहुँच जाता था। फिर भी जब क्लास में टीचर पढ़ाते, तो वह पूरी कोशिश करता कि ध्यान से सुने, क्योंकि उसे पता था—यही उसका एकमात्र मौका है कुछ बनने का।
एक दिन क्लास में शहर से आए एक मेहमान ने बच्चों से सवाल पूछा,
“बताओ, तुम में से कौन-कौन रोज़ होमवर्क करता है?”
कई बच्चों ने हाथ उठाए, लेकिन रवि चुपचाप बैठा रहा। मेहमान ने उसे देखकर कहा,
“तुम हाथ क्यों नहीं उठा रहे? क्या तुम्हें पढ़ाई में रुचि नहीं है?”
रवि ने धीरे से सिर झुका लिया। टीचर ने उसकी ओर देखा, जैसे उन्हें उसकी हालत पहले से पता हो। अगले दिन वही मेहमान रवि के घर पहुँचे, ताकि सच्चाई समझ सकें।
वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा—रवि की माँ खेत जाने की तैयारी कर रही थी और उसके छोटे दो भाई-बहन रो रहे थे। माँ ने रवि से कहा,
“बेटा, आज स्कूल मत जाना, इन दोनों को संभालना। मुझे खेत पर जाना है, नहीं तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा।”
मेहमान यह सब देखकर चुप हो गए। उन्हें समझ आने लगा कि जिस बच्चे से रोज़ होमवर्क की उम्मीद की जा रही थी, वह तो कई बार स्कूल ही नहीं जा पाता, क्योंकि उसे अपने छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
कुछ दिन बाद वे फिर स्कूल आए। इस बार उन्होंने बच्चों की ड्रेस पर ध्यान दिया। रवि की यूनिफॉर्म वही थी जो पूरे साल से वह पहन रहा था—अब छोटी हो चुकी थी, किनारों से फटी हुई। पूछने पर पता चला कि घर में जब कभी पैसे आते, तो उन्हें पहले राशन, दवाई या कर्ज़ चुकाने में खर्च करना पड़ता था। नई ड्रेस या कॉपी-पेंसिल खरीदना उनकी प्राथमिकता नहीं बन पाता था।
एक शाम मेहमान ने रवि के घर का माहौल भी देखा। घर में न तो पढ़ने की कोई मेज थी, न रोशनी का ठीक इंतज़ाम। रात होते ही घर में टीवी की आवाज़, छोटे बच्चों का शोर और थके हुए माता-पिता की बातें—इन सबके बीच पढ़ाई के लिए कोई शांत कोना ही नहीं था। न कोई मार्गदर्शन देने वाला, न पढ़ने का निश्चित समय।
अब मेहमान को समझ में आने लगा था कि सरकारी स्कूलों के बच्चों की तुलना निजी स्कूलों के बच्चों से करना कितना आसान है, लेकिन उनके हालात समझना कितना मुश्किल।
कुछ दिनों बाद स्कूल में एक छोटी सभा रखी गई। मेहमान मंच पर आए और बोले—
“हम अक्सर कहते हैं कि सरकारी स्कूलों के बच्चे पढ़ाई में पीछे क्यों रह जाते हैं। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि क्या हम उस बच्चे की तुलना कर सकते हैं, जो बिना नाश्ता किए खाली पेट स्कूल आता है?
क्या हम उस बच्चे की तुलना कर सकते हैं, जिसे खुद उसके माता-पिता कहते हैं—आज स्कूल मत जाओ, अपने छोटे भाई-बहनों को संभालो?
क्या हम उस बच्चे की तुलना कर सकते हैं, जिसके पास पेन-पेंसिल तक नहीं होती, और जिसकी ड्रेस साल भर में एक ही रहती है?
क्या हम उस बच्चे की तुलना कर सकते हैं, जिसके घर में पढ़ाई का माहौल ही नहीं, न कोई मार्गदर्शन, न पढ़ाई का समय?”
पूरा स्कूल शांत था। हर कोई उनकी बात सुन रहा था।
उन्होंने आगे कहा—
“सरकारी स्कूलों पर उंगली उठाने से पहले हमें इन बच्चों की परिस्थितियों को समझना होगा। इन बच्चों में कमी नहीं है, कमी उनके अवसरों में है। अगर इन्हें भी सही भोजन, सही माहौल और सही मार्गदर्शन मिले, तो ये किसी से कम नहीं होंगे।”
उस दिन के बाद स्कूल के कई शिक्षक और गाँव के कुछ लोग मिलकर बच्चों के लिए छोटी-सी शाम की कक्षा शुरू करने लगे। कुछ लोगों ने पुरानी किताबें और ड्रेस दान दीं। धीरे-धीरे रवि जैसे कई बच्चों की पढ़ाई में सुधार आने लगा।
तुलना करने से पहले परिस्थितियों को समझना जरूरी है। क्योंकि हर बच्चा समान क्षमता लेकर जन्म लेता है, लेकिन हर बच्चे को समान अवसर नहीं मिलते।


















