April 20, 2026 4:05 am

ट्रेन के एक डिब्बे में अचानक हलचल मच गई। “अरे ज़रा हटो, ज़रा हटो…!” एक महिला हाथ में गरम-गरम समोसों की टोकरी लिए यात्रियों के बीच से निकल रही थी।।

 

अशोक ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट एक महिला हाथ में गरम-गरम समोसों की टोकरी लिए यात्रियों के बीच से निकल रही थी।

उसकी साड़ी के पल्लू में पसीना पोंछने की आदत और पैरों में घिसे-घिसे सैंडल देखकर कोई नहीं कह सकता था कि इस औरत के खाते में करोड़ों रुपए हैं।

हाँ… वही औरत, जिसे आज लोग “समोसा क्वीन” के नाम से जानते हैं।

लेकिन यह कहानी आज की नहीं है… यह कहानी उस दिन से शुरू होती है, जब उसके पास एक समोसा खरीदने के भी पैसे नहीं थे।

अतीत का तूफ़ान

उसका नाम सुमन था।

शादी के पाँच साल बाद ही उसका पति दिल का दौरा पड़ने से चल बसा।

दो छोटे बच्चे — एक 4 साल का बेटा और 2 साल की बेटी — और सिर पर कर्ज़ का पहाड़।

गाँव में रिश्तेदारों ने सलाह दी,

“सुमन, शहर चली जा, यहाँ तेरे बच्चों का क्या होगा?”

सुमन बच्चों को लेकर भोपाल आ गई।

शहर बड़ा था, पर उसके लिए एकदम अजनबी।

घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, खाना… सब कुछ एक पहाड़ जैसा लग रहा था।

पहली कमाई की कोशिश

एक दिन स्टेशन पर बैठी थी, जेब में सिर्फ 50 रुपये बचे थे।

ट्रेन के यात्रियों को गरम-गरम समोसे खाते देखा, तो उसके दिमाग़ में ख्याल आया —

“क्यों न मैं भी समोसे बेचूँ?”

अगले दिन उसने एक छोटी कढ़ाई, आलू, मसाले खरीदे और घर में समोसे बनाकर स्टेशन पर बेचने लगी।

पहले दिन उसने 40 समोसे बनाए, सब बिक गए।

मुनाफा सिर्फ 80 रुपये का था, लेकिन सुमन के चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान थी।

सफ़र में पहचान

धीरे-धीरे उसकी पहचान बन गई।

ट्रेन के यात्री उसे नाम से बुलाने लगे —

“अरे सुमन बहन, आज तो गरम वाले देना!”

उसके समोसे सिर्फ खाने में नहीं, कहानी में भी गरम थे — हर यात्री उससे बात करता, उसका हाल पूछता।

कुछ महीनों में उसने रोज़ 200–300 समोसे बनाना शुरू कर दिए।

बच्चे स्कूल जाने लगे।

मुसीबत का पहाड़

लेकिन सफ़र आसान नहीं था।

रेलवे के टिकट चेकर और ठेकेदार उसे ताने मारते, कभी दुकान लगाने से रोकते।

कभी-कभी समोसे ज़्यादा बनते और बचे हुए फेंकने पड़ते।

पर सुमन ने हार नहीं मानी।

उसने यात्रियों के सुझाव से नए फ्लेवर के समोसे बनाने शुरू किए — पनीर, मिक्स वेज, मीठे समोसे।

यात्रियों को यह इतना पसंद आया कि लोग उसके समोसे पैक करवाकर घर ले जाने लगे।

टर्निंग पॉइंट

एक दिन ट्रेन में एक बिजनेसमैन सफ़र कर रहा था।

उसने सुमन के समोसे खाए और कहा,

“तुम्हारा स्वाद मार्केट में छा सकता है। क्या तुम बड़ा काम करना चाहोगी?”

सुमन पहले तो डर गई, लेकिन उसने हाँ कर दी।

उस बिजनेसमैन ने उसे छोटे-से शॉप का किराया दिलवाया और पैकेजिंग का आइडिया दिया।

अब सुमन सिर्फ ट्रेन में नहीं, बल्कि ऑर्डर पर भी समोसे सप्लाई करने लगी।

समोसा क्वीन

10 साल में सुमन का नाम भोपाल से बाहर भी फैल गया।

उसके पास 12 आउटलेट्स हो गए, 50 लोग उसके लिए काम करने लगे।

हर महीने लाखों की कमाई होने लगी।

आज भी, जब वह किसी ट्रेन से गुजरती है, तो एक डिब्बे में जाकर पुराने दिनों की तरह कुछ समोसे खुद बेचती है।

लोग कहते हैं, “अरे, करोड़पति होकर भी…?”

वो बस मुस्कुरा देती है —

“ये सफ़र मुझे याद दिलाता है कि मैं कहाँ से उठकर यहाँ तक आई हूँ।”

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