
“रिश्वत माँगने वाला पुलिस वाला भी काँप गया जब एक साधारण टैक्सी ड्राइवर ने रेडियो पर सीधे रीजनल ऑफिसर से मदद माँगी – क्या न्याय की यह आवाज भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेगी?”
सुबह की पहली किरण के साथ ही राजेश की टैक्सी दिल्ली-आगरा हाईवे पर दौड़ रही थी। आधा दिन बाकी था, लेकिन ट्रैफिक की गर्मी और बोझ पहले से ही सीने पर सवार था। रियर व्यू मिरर में नजर पड़ती थी उन यात्रियों पर—एक कॉलेज स्टूडेंट फोन में खोया हुआ, एक माँ गोद में छोटे बच्चे को थामे हुए जो बुखार से तप रहा था, एक थका हुआ मजदूर जो नाइट शिफ्ट से लौट रहा था।
“भैया, क्या टाइम पर पहुँच पाएँगे?” एक महिला ने घबराहट से पूछा।
“हाँ मैडम, बस चेकपॉइंट पर फँस न जाएँ,” राजेश ने मुस्कुराकर कहा।
लेकिन जैसे ही आगे बढ़े, cones और लाइटें नजर आईं। चार पुलिस वाले रास्ता रोककर खड़े थे। एक अफसर ने हाथ हिलाया—”टैक्सी! साइड में!”
राजेश ने गाड़ी रोकी। “गुड मॉर्निंग सर। क्या बात है?”
“उतरो पहले,” पुलिसवाले ने ठंडे लहजे में कहा। “रिपोर्ट है यह गाड़ी बिना परमिट की है।”
यात्री हक्के-बक्के। “भैया, बिना परमिट?” माँ ने बच्चे को कस लिया।
“सर, मेरे पास पूरा परमिट है,” राजेश ने फोल्डर निकाला। लेकिन पुलिसवाले ने छीन लिया और पलटने लगा। “इतनी जल्दी क्यों? कुछ छिपा रहे हो?”
“कुछ नहीं सर। यात्री हैं, बच्चा बीमार है।”
दूसरा पुलिसवाला मुस्कुराया—”अगर इंपाउंड नहीं चाहते, तो समझ गए न?”
राजेश का जबड़ा सख्त हो गया। वह जानता था यह कोड वर्ड क्या मतलब रखता है। लेकिन आज बच्चे की तबीयत… वह नहीं झुक सकता था।
“सर, मैं रिश्वत नहीं देता,” उसने शांत लेकिन मजबूत आवाज में कहा।
पुलिसवाले का चेहरा लाल हो गया। “बहादुर बन रहा है? गाड़ी होल्ड!”
चाबी छीन ली गई। यात्री चिल्लाने लगे—”हमारा क्या होगा?” “बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाना है!”
पुलिसवाले ने सबको डाँटा—”चुप! कोई नीचे नहीं उतरेगा!”
राजेश के सीने में आग लगी। स्लिंग बैग में पुरानी रेडियो थी—पुरानी नौकरी की याद। उसने दबाई और काँपती आवाज में कहा:
“बेस… बेस… राजेश बोल रहा हूँ। मदद चाहिए।”
और जवाब आया—साफ, सख्त आवाज में:
“रिसीव्ड, राजेश। पुलिस रीजनल ऑफिस ऑपरेशंस सेंटर बोल रहा है। स्थिति बताओ।”
पुलिसवाले ठिठक गए। जैसे बिजली गिर गई हो। “पुलिस रीजनल ऑफिस?” एक ने फुसफुसाया।
राजेश ने फिर रेडियो पर कहा—”चेकपॉइंट पर रोका गया हूँ। रिश्वत माँग रहे हैं। बच्चा बीमार है।”
रीजनल सेंटर की आवाज आई—”लोकेशन बताओ। सुपरवाइजर का नाम।”
पुलिसवाले काँपने लगे। “तू कौन है?” चिल्लाया, लेकिन आवाज में डर था।
राजेश शांत रहा—”सर, बस ठीक से होने दो। बच्चा अंदर है।”
लेकिन पुलिसवाला और उत्तेजित—”इंपाउंड करो!”
रेडियो फिर बजी—”ऑन-सीन ऑफिसर्स, स्टैंड डाउन। पहचान बताओ।”
कोई जवाब नहीं। दूर से सायरन की आवाज आने लगी।
क्या होगा आगे? क्या एक साधारण टैक्सी ड्राइवर की हिम्मत भ्रष्ट पुलिसवालों को सबक सिखा पाएगी? क्या बच्चे की जान बचेगी? क्या न्याय की यह छोटी सी आवाज पूरे सिस्टम को हिला देगी?


















