
सुशील शंकर विग एडिटर इन चीफ की रिपोर्ट
शुभेंदु अधिकारी की शपथ लेते ही सिर्फ बंगाल नहीं, पूरी दुनिया में हलचल मच गई… अमेरिका से लेकर यूरोप तक के बड़े अखबार अचानक मोदी की ताकत पर नए विश्लेषण करने लगे, और सबसे ज्यादा बेचैनी दिखाई बांग्लादेश में। आखिर ऐसा क्या हुआ कि पश्चिम बंगाल का चुनाव एक राज्य का चुनाव न रहकर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया?
दोस्तों, पिछले कुछ दिनों से एक सवाल हर जगह सुनने को मिल रहा है—आखिर पश्चिम बंगाल को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? देश में और भी बड़े राज्य हैं, कई जगह चुनाव हुए, सरकारें बनीं, लेकिन दुनिया भर की मीडिया सिर्फ बंगाल पर ही क्यों टूट पड़ी? आखिर ऐसा क्या बदल गया कि अमेरिका, यूरोप, बांग्लादेश, चीन और यहां तक कि तुर्की तक के अखबारों में एक ही नाम बार-बार गूंजने लगा—नरेंद्र मोदी और शुभेंदु अधिकारी।
कहानी की शुरुआत होती है उस शपथ ग्रहण से, जिसे बहुत लोग सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम समझ रहे थे। लेकिन जैसे ही शुभेंदु अधिकारी ने सत्ता संभाली, अंतरराष्ट्रीय मीडिया का पूरा नैरेटिव बदलने लगा। जो अखबार कल तक मोदी सरकार की आलोचना करते थे, वही अब लिखने लगे कि भाजपा ने भारत की सबसे कठिन राजनीतिक दीवारों में से एक को तोड़ दिया है।
बीबीसी ने लिखा—“मोदी की भाजपा ने भारत के सबसे कठिन राजनीतिक मोर्चों में जीत हासिल कर ली।”
द गार्डियन ने इसे “ऐतिहासिक बदलाव” बताया।
और वाशिंगटन पोस्ट ने तो यहां तक लिख दिया कि मोदी ने अपने सभी आलोचकों को पीछे छोड़ दिया।
लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है…
दुनिया को सबसे बड़ा झटका इसलिए लगा क्योंकि पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं माना जाता। यह हमेशा से भाजपा के लिए सबसे कठिन किला समझा जाता था। वर्षों तक यहां क्षेत्रीय राजनीति, अलग विचारधारा और मजबूत विपक्ष का दबदबा रहा। इसलिए जब भगवा लहर ने वहां प्रवेश किया, तो दुनिया भर के रणनीतिकार चौंक गए।
सबसे ज्यादा बेचैनी बांग्लादेश में दिखाई दी।
ढाका के अखबारों में लगातार खबरें छपने लगीं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत सिर्फ भारत का आंतरिक मामला नहीं है। वहां के विश्लेषक इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखने लगे। अचानक तीस्ता जल समझौता, सीमा सुरक्षा और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर चर्चाएं तेज हो गईं।
बांग्लादेशी मीडिया में यह डर खुलकर दिखने लगा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहेंगे।
कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ममता बनर्जी की मौजूदगी को लेकर ढाका हमेशा आश्वस्त रहता था। लेकिन सत्ता बदलने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। यही वजह थी कि वहां के कुछ नेताओं के बयान अचानक बेहद नरम और चिंतित नजर आने लगे।
इधर पश्चिमी मीडिया भी लगातार एक ही सवाल पूछ रही थी—क्या यह जीत मोदी को पहले से ज्यादा शक्तिशाली बना देगी?
फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा कि बंगाल की जीत के बाद भारत के पूर्वी हिस्से पर भाजपा का प्रभाव और मजबूत हो गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे “विपक्ष के अंतिम बड़े गढ़ का पतन” कहा।
और जर्मनी की DW ने लिखा कि यह सिर्फ एक राज्य की जीत नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा मोड़ है।
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि लगभग हर विदेशी अखबार एक ही चीज दोहरा रहा था—2024 के बाद जो लोग मान रहे थे कि मोदी कमजोर पड़ गए हैं, बंगाल की जीत ने उस धारणा को पूरी तरह बदल दिया।
अब चर्चा सिर्फ बंगाल की नहीं रह गई थी।
चर्चा होने लगी कि क्या 2029 का रास्ता भी यहीं से तय हो गया?
क्या भाजपा अब देश के हर हिस्से में अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है?
क्या विपक्ष वास्तव में बिखर चुका है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या दुनिया को अब भारत के साथ नए तरीके से व्यवहार करना पड़ेगा?
तुर्की का अखबार लिखता है कि मोदी की स्थिति तीसरे कार्यकाल के बीच और मजबूत हो गई है।
अलजजीरा मानता है कि जिन लोगों ने भाजपा की हार की भविष्यवाणी की थी, वे पूरी तरह गलत साबित हुए।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने तो यहां तक कहा कि यह जीत एशिया की शक्ति संतुलन राजनीति को प्रभावित कर सकती है।
अब सवाल यह नहीं था कि बंगाल में कौन जीता…
सवाल यह था कि इस जीत के बाद भारत कितना बदलने वाला है।
और इसी बीच कुछ ऐसे बयान सामने आने लगे, जिन्होंने पूरे मामले को और विस्फोटक बना दिया। सीमा, घुसपैठ, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदू राजनीति को लेकर जो बातें पहले बंद कमरों में होती थीं, वे अब खुले मंचों पर दिखाई देने लगीं।
दुनिया के बड़े-बड़े विश्लेषक समझने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर बंगाल में ऐसा क्या हुआ, जिसने मोदी की राजनीति को अचानक वैश्विक चर्चा का केंद्र बना दिया।
लेकिन दोस्तों… असली खेल अभी बाकी था।
क्योंकि जो अंदरखाने चल रहा था, वह सिर्फ एक चुनावी जीत की कहानी नहीं थी…
बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति, विदेश नीति और पूरे दक्षिण एशिया की दिशा बदलने वाला संकेत माना जा रहा था..!

शुभेंदु अधिकारी की शपथ लेते ही सिर्फ बंगाल नहीं, पूरी दुनिया में हलचल मच गई… अमेरिका से लेकर यूरोप तक के बड़े अखबार अचानक मोदी की ताकत पर नए विश्लेषण करने लगे, और सबसे ज्यादा बेचैनी दिखाई बांग्लादेश में। आखिर ऐसा क्या हुआ कि पश्चिम बंगाल का चुनाव एक राज्य का चुनाव न रहकर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया?

















