
रंजू चबारा ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट
*दरबार साहिब अमृतसर में लंगर छकते समय सामने एक व्यक्ति लंगर छक रहा था तथा आँखों से बहते आँसू भी पोंछता जा रहा था।मैं देख के हैरान था कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। लंगर छकने के बाद मुझसे रहा नहीं गया, बाहर निकलते ही मैंने उसे रोक कर पूँछ ही लिया कि वह ऐसा क्यों कर रहा था?उसने दोनों हाथ जोड़ लिये और बोला सरदार जी आप के गुरू महान हैं जिन्होंने जात पात और ऊँच नीच के भेदभाव को मिटा कर एक पंक्ति में बिठा कर भोजन करने की परंपरा बना दी।मैं बंबई से आया हूँ और मैं इस लिए रो रहा था कि मैं जिस फेक्टरी में कार्य करता हूँ उस का मालिक बहुत क्रूर स्वभाव का है। फेक्टरी में हर समय अपशब्द बोल कर जी तोड़ मेहनत कराता है। दोपहर में खाना खाते समय भी बोलता रहता है कितनी देर तक खाना खाते रहोगे। परेशान हो कर खाना भी छूट जाता है।आज वह मेरा मालिक जो हम नौकरों से नफरत करता है हमें खाना भी नहीं खाने देता है, आज वो भी सामने की पंगत में बैठा सिर झुका के लंगर छक रहा था। न तो मेरे भोजन को देख रहा था और न मुझे डाँट रहा था । क्यों कि आज यहाँ लंगर मे वह मालिक नहीं था और मैं नौकर नहीं था। धन्य हो आप सरदार जी जो आप का जन्म सिक्ख परिवार में हुआ और आप को ऐसे गुरू प्राप्त हुये जिन्होंने ऊंच नीच और छोटे बड़े का भेदभाव मिटा दिया ।आज यहां आकर लगा ” सबना जिया का एक दाता सो मैं विसर ना जाई ” और हाथ जोड़ कर गुरू को आभार प्रकट करता हुआ चला गया।*


















