
संदीप सबरवल ब्यूरो चीफ की कलम से
देश तोड़ो एजेंडा ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं :-
सबसे पहले दो जरूरी खबरें जानिए ।
पहली तो दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की याचिका ख़ारिज कर दी । इस याचिका में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी मुचलका (Personal Bond) और एक जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया था।अब SEM कोर्ट में नेहा को शांति बाँड भरना पड़ेगा,लिखित में माफ़ी भी माँगनी पड़ेगी ।शरजिल इमाम की तरह नेहा बोरा के देश को बांग्लादेश बनाने वाले बयान पर कोर्ट अलग से हिसाब करेगी ।आज नहीं तो कल इसे भी जेल जाना ही पड़ेगा
दूसरी ओर आंदोलन के चरम पर राहुल गांधी एकाएक गायब हो गए । कथित तौर पर वियतनाम दौरे के नाम पर वो कहां है? ये किसी को नहीं पता । एक दो दिन में वो सामने आयेंगे तब कांग्रेसियों के स्पष्टीकरण शुरू हो जायेंगे । लेकिन मुख्य बात वे नए भारत विरोधी एजेंडे के साथ आयेंगे । ज्ञानेश कुमार की फिल्म फ्लॉप होने के कारण अबकी बार नया मुद्दा आएगा । ज्यादा संभावना चीन से सम्बंधित मुद्दों की होगी । चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया ,जैसे झूठे बयानों को बाढ़ आएगी । नया नैरेटिव सेट करने के प्रयास होंगे ।लेकिन उस नैरेटिव को भी फेल होना होगा
असल में वक्त बदलते देर नहीं लगती । क्या आपने गौर किया कि यह आंदोलनकारी अपने पूर्व बयानों से भागने लगे हैं ? इन नेताओं में यदि काकरोच चीफ़ अभिजीत दीपके , आईफा अध्यक्ष नेहा बोरा और आंदोलनजीवी योगेंद्र यादव जैसे लोग भी शामिल हों तो औचित्य का सवाल तो उठता है । आपने देखा दीपके बार बार सौरभ दास और अभिषेक रांका को अपना नियंता मार्गदर्शक बता रहे हैं ? आखिर क्यों ? तीन सवाल अहम हैं—ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन का रुख क्यों बदल रहा है ? नेहा बोरा, योगेंद्र यादव और दीपके के बयानों में बदलाव का क्या अर्थ निकाला जाए ? क्या युवाओं को न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ी आशंकाएँ हैं ?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध अब एक नए राजनीतिक मोड़ पर आता दिखाई दे रहा है । शुरुआत मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवालों से हुई थी । लेकिन जब आंदोलन के मंच से रिजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन की बात उठी, तब आंदोलन के उद्देश्य और नेतृत्व को लेकर बहस तेज हो गई । यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है । नेहा बोरा ने आंदोलन को लोकतंत्र और मताधिकार की व्यापक लड़ाई बताया है । वे बांग्लादेश संबंधी अपने बयान से भी पीछे हट रही हैं । परजीवी पैरासाइट योगेंद्र यादव तो सड़क से सत्ता वाले बयान से भी मुकर गए । बोले रिजिम चेंज वोट से होगा ।
अभिजीत दीपके ने आंदोलन को सत्ता परिवर्तन के एजेंडे से अलग करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग तक सीमित है । यह अंतर मामूली नहीं है । यदि कोई आंदोलन एक संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग से आगे बढ़कर सरकार बदलने का लक्ष्य घोषित करने लगे, तो उसके स्वरूप और विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है । युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं । उनकी नाराजगी को केवल राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता । लेकिन आंदोलनकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी मांग क्या है ? उसका संवैधानिक आधार क्या है ? और उसका समाधान किस प्रक्रिया से निकलेगा ?
यह अंत नहीं शुरुआत है । आंदोलन अभी बहुत से बाकी हैं । साहब पूरी तरह ट्रेंड होकर वियतनाम से लौटेंगे , 1 नवंबर के प्रदर्शन में वह सब बाहर आएगा जो वे सीखकर आएंगे ? आपको यकीन न आए तो साहब के भारत की धरती पर उतरने के बाद उनका एक एक बयान ध्यान से सुनिये । यकीन मानिए आपको अमेरिकी सोरस और चीनी सिंघम की गंध आएगी । पर इससे होने वाला कुछ नहीं । आंदोलनों से ऊबी देश की जनता इतना ज्यादा समझ गई है कि दीपके , बोरा और योगेंद्र यादव जैसे आंदोलनजीवी मुँह छिपाने लगे हैं । गौर करना आप , वक्त आ रहा है , जरूर करना । राहुल गांधी का देश तोड़ो एजेंडा ज्यादा दिनों का मेहमान नह



















