
राश्मि शर्मा ब्यूरो चीफ की कलम से बेटियों, खुद को पहचान लेना – एक पिता तुल्य लेखक का आह्वान
इश्क के मीठे जाल में कभी भटक मत जाना,
पल भर की चमक के लिए अपने संस्कार भूल मत जाना।
जो आज कहे तुम ही मेरी दुनिया हो, कल मुकर जाएगा,
ऐसे झूठे सवेरे में अपनी शाम मत गँवाना।
आज की इस पावन सुबह में मेरी कलम उन समस्त युवा, मासूम और कोमल हृदय वाली बेटियों को समर्पित है जो अनजाने में, नादानी में, या क्षणिक भावनाओं में बहकर जीवन की मुख्य धारा से भटक जाती हैं।
हे बेटियों! सुनो –
इश्क करना ही है तो खुद से करो, अपने सपनों से करो, अपनी किताबों से करो, अपने लक्ष्य से करो। इतनी काबिल बन जाओ कि ज़माना खुद तुम पर नाज़ करे।
याद रखना, जिन पिताओं ने तुम्हारी नन्हीं उंगली पकड़ कर तुम्हें चलना सिखाया, जिन माताओं ने रात-रात भर जाग कर तुम्हें सुला कर अपने आँचल में पाला, उन झुके हुए कंधों और उन आँखों के आँसुओं को कभी मत भूलना। तुम्हारी एक मुस्कान से पूरे घर में उजाला होता है, तुम ही तो बाबुल की लाडो और माँ की माला हो।
आज का यह स्क्रीन वाला प्यार, मोबाइल की चैट में पनपा प्यार, अक्सर सिर्फ छलावा है। जो आज कहे ‘तुम ही मेरी दुनिया हो’, वही कल तुम्हें अंधेरे में छोड़कर मुकर जाएगा।
बेटियों, प्रेम पाप नहीं है, पर प्रेम की भी एक उम्र होती है, एक मर्यादा होती है। पहले पढ़ना-लिखना होता है, फिर अपने पैरों पर खड़ा होना होता है। जब तुम अपने पैरों पर खड़ी होगी, तो हर रिश्ता खुद-ब-खुद सजेगा। इसलिए किसी अनजाने चेहरे के पीछे अपना उज्ज्वल भविष्य कभी मत खोना।
एक भूल से जीवन भर पछताना न पड़े, इसलिए हे मेरी बेटियों, थोड़ा संभल जाना, खुद को पहचान लेना।
- नोट: यह रचना सिर्फ सामाजिक चेतना के लिए है, इसका किसी व्यक्ति, घटना या स्थान से कोई संबंध नहीं है, अतः किसी भी उल्लंघन के लिए लेखक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं है।




















