
वीना विग एडिटर की रिपोर्ट
एक पुलिसवाला रोज़ एक ही पेड़ को सलाम करता था… उसकी रिटायरमेंट वाले दिन सबको वजह पता चली।
ठीक आठ बजते ही शहर के पुराने चौक पर खड़े विशाल बरगद के पेड़ के सामने एक पुलिसवाला रुकता, अपनी टोपी ठीक करता और पूरे सम्मान से सलाम करता। फिर बिना कुछ बोले अपनी ड्यूटी पर निकल जाता।
यह सिलसिला एक-दो दिन का नहीं, पूरे तीस साल से चल रहा था।
लोगों ने कई बार देखा, लेकिन किसी को समझ नहीं आया कि आखिर एक पेड़ को सलाम करने की क्या वजह हो सकती है।
कुछ लोग हँसते।
“लगता है साहब का दिमाग़ थोड़ा ज़्यादा ईमानदार हो गया है।”
कुछ कहते,
“ज़रूर कोई मन्नत होगी।”
नए सिपाही भी कई बार पूछते, मगर इंस्पेक्टर रघुवीर सिंह हमेशा मुस्कुरा कर बस इतना कहते,
“जिस दिन वर्दी उतारूँगा, उस दिन बता दूँगा।”
धीरे-धीरे यह बात पूरे शहर में मशहूर हो गई।
फिर वह दिन भी आ गया…
रघुवीर सिंह की रिटायरमेंट थी।
पूरा थाना, अधिकारी, पत्रकार और शहर के लोग उन्हें विदाई देने आए थे।
कार्यक्रम खत्म हुआ तो सबने एक ही सवाल पूछा—
“सर… अब तो बता दीजिए, आप रोज़ उस बरगद को सलाम क्यों करते थे?”
रघुवीर सिंह कुछ पल चुप रहे।
उनकी आँखें बरगद की ओर उठीं।
आज भी उन्होंने वैसा ही सलाम किया…
लेकिन इस बार सलाम करते-करते उनका हाथ काँप गया।
आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहना शुरू किया—
“आज से ठीक तीस साल पहले… मैं पुलिस में नया-नया भर्ती हुआ था। वर्दी का घमंड सिर पर था। लगता था मैं जो चाहूँ, वही कानून है।”
“एक रात तेज़ बारिश हो रही थी। इसी चौक पर मेरी ड्यूटी लगी थी। तभी एक बूढ़ा आदमी दौड़ता हुआ आया। उसके कपड़े भीगे हुए थे। उसने हाथ जोड़कर कहा…”
“साहब… मेरी बेटी की तबीयत बहुत खराब है। अस्पताल ले जाना है। रास्ता बंद है, मदद कर दीजिए।”
रघुवीर ने सिर झुका लिया।
“उस दिन मैं चिढ़ा हुआ था। मैंने उसे डाँट दिया। कहा—’भाग यहाँ से… मुझे परेशान मत कर।'”
“बेचारा बूढ़ा कुछ देर तक हाथ जोड़ता रहा… फिर चला गया।”
भीड़ बिल्कुल शांत थी।
रघुवीर की आवाज़ भर्रा गई।
“करीब आधे घंटे बाद सूचना मिली कि चौक के पास एक बच्ची और उसके पिता सड़क किनारे बेहोश पड़े हैं।”
“जब मैं पहुँचा… तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”
“बच्ची की साँसें रुक चुकी थीं…”
“और उसका पिता… उसी बरगद के नीचे बैठा था।”
“वह मुझे देखकर बोला…”
“‘साहब… अगर आप पाँच मिनट पहले मदद कर देते… तो मेरी गुड़िया बच जाती।'”
“इतना कहकर उसने बच्ची को सीने से लगाया… और वहीं हार्ट अटैक से उसकी भी मौत हो गई।”
पूरा मैदान सन्नाटे में डूब गया।
रघुवीर की आवाज़ टूटने लगी।
“उस दिन पहली बार समझ आया कि वर्दी इंसान से बड़ी नहीं होती।”
“मैंने उसी बरगद के नीचे दोनों की लाशें देखीं…”
“और वहीं खड़े होकर कसम खाई कि आज के बाद इस वर्दी का इस्तेमाल कभी किसी को डराने के लिए नहीं करूँगा… सिर्फ़ लोगों की मदद करने के लिए करूँगा।”
उन्होंने गहरी साँस ली।
“उस दिन से हर सुबह मैं इस पेड़ को नहीं… अपने अपराधबोध को सलाम करता था।”
“ताकि मुझे याद रहे कि मेरी एक गलती ने दो ज़िंदगियाँ छीन ली थीं।”
लोगों की आँखें भर आई थीं।
रघुवीर आगे बोले—
“उस घटना के बाद मैंने कभी किसी गरीब, बूढ़े या मजबूर इंसान को खाली हाथ नहीं लौटाया।”
“रात हो या दिन… छुट्टी हो या त्योहार… जहाँ मदद की पुकार सुनी, वहाँ पहुँचा।”
“लोग कहते थे मैं बहुत अच्छा पुलिसवाला हूँ…”
“लेकिन सच यह है कि मैं हर दिन अपनी एक गलती का कर्ज़ चुका रहा था।”
इतना कहकर उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी, धुंधली तस्वीर निकाली।
उसमें वही छोटी बच्ची मुस्कुरा रही थी।
“यह तस्वीर मुझे उसके पिता की जेब से मिली थी।”
“तीस साल से यह मेरे दिल के सबसे करीब रही।”
“जब भी कभी गुस्सा आता… मैं यही तस्वीर देख लेता।”
अब वहाँ मौजूद बड़े-बड़े अधिकारियों की आँखें भी नम थीं।
रघुवीर धीरे-धीरे बरगद के पास गए।
उसके तने को दोनों हाथों से छुआ।
फुसफुसाकर बोले—
“मुझे माफ़ कर देना… मैं तुम्हारी गुड़िया वापस नहीं ला सका।”
हवा का एक तेज़ झोंका आया।
बरगद की सूखी पत्तियाँ टूटकर उनके कंधों पर गिरने लगीं।
ऐसा लगा जैसे प्रकृति खुद उन्हें अंतिम विदाई दे रही हो।
रघुवीर ने अपनी पुलिस कैप उतारी, बरगद की जड़ के पास रखी और बिना पीछे देखे चल पड़े।
उस दिन पूरे शहर ने पहली बार समझा…
कि सबसे बहादुर पुलिसवाला वह नहीं होता जो अपराधियों को पकड़ ले।
सबसे बहादुर वह होता है जो अपनी गलती को जीवन भर याद रखे, उसे स्वीकार करे और हर दिन किसी अनजान इंसान की मदद करके उसका प्रायश्चित करता रहे।
क्योंकि कुछ सलाम सम्मान के लिए नहीं होते…



















