
संदीप सबरवल ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट
थर्रा उठी थी द्वापरयुग की वो सुबह असंख्य महारथियों का जमघट एक साथ देख कर!
थर्रा उठी थी धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र की वो मरुभूमि भी अनगिनत द्वैपद एवं चतुष्पद पदों के चाप से!
थर्रा तो स्वयं वह सदी भी उठी थी असंख्य शवों का भार उठाने के भय से किंतु मुस्कुरा रही थी नियति,मृत्यु की देवी के अधरों पर भी मुस्कान थी ।
और खिलखिला उठी थी पांचाली अपने शिविर में!
और नियति नियंता के अधरों पर तो चिरपरिचित मुस्कान थिरक ही रही थी!
“सज्जनों को व्यक्तिगत समस्या पर क्रोध करने से बचना चाहिए पार्थ। ” शोकाकुल अर्जुन को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए ही कहा!
“तो क्या द्रौपदी वस्त्र हरण पर हमें क्रोध नहीं करना चाहिए था केशव?” किंकर्तव्यविमूढ़ धनन्जय ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा!
“इसका प्रतिउत्तर मैं कैसे दूं पार्थ यह तो तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर करता है किन्तु द्रौपदी वस्त्र हरण तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या नहीं है पार्थ!
द्रौपदी वस्त्र हरण तो एक सामाजिक समस्या है!” भगवान् ने बड़ी व्याकुलता से कहा और उनका मुखमंडल तमतमा उठा!
” जो समाज इंद्रप्रस्थ की महारानी के वस्त्र हरण पर चुप रह गया वो भला एक साधारण नारी के मान हरण पर कभी प्रतिरोध कर सकेगा पार्थ?” भगवान् यह कहते-कहते विकल हो उठे किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने अर्जुन को ललकारते हुए पुनः कहना आरंभ किया!
” हे धनन्जय! समाज में एक आदर्श स्थापित करने के लिए यह तुम्हारा परम कर्तव्य है कि अपनी गांडीव उठाओ! और इन आतताइयों के साथ युद्ध करो और उनके पक्ष में खड़े सभी लोग तुम्हारे ही नहीं बल्कि समस्त समाज के शत्रु हैं इसलिए इनका वध भी नीति संगत ही नहीं बल्कि शास्त्र सम्मत भी है!
ताकि आने वाली संततियां इससे यह सीख सकें कि एक नारी का मान हरण करने वाला सदैव मृत्यु दंड का ही पात्र होता है।
और उसके सहयोगी भी उतने ही अपराधी कहे जाते हैं उनका वध भी सर्वथा उचित ही नहीं अनिवार्य भी है! ”
इसलिए हे भारत।
किसी नारी का शील हरण किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्या है ही नहीं वह तो एक सामाजिक समस्या है। जिसके लिए समाज के हर व्यक्ति को प्रतिकार करना चाहिए!
ऐसे दुराचारियों को दंड देना सभी का नैतिक कर्तव्य है! इनको बचाने का प्रयास करने वाले लोग भी उसी दंड के अधिकारी होते हैं!
जो समाज किसी अबला पर हुए अत्याचार पर आंख बंद कर मौन रह जाता है उसे एक दिन अपना सब कुछ खोकर अपने ही परिजनों के शवों पर विलाप करना पड़ता है!
यही यथार्थ है यही यथार्थ है मित्र!
उसने तो अभी स्त्री और पुरुष का भेद भी सही तरीके से नहीं जना था। उसने तो बस पुरुष के रूप में पिता का दुलार औन भाइयों का स्नेह ही देखा था।
उसे भला कहां पता था कि पुरुषों में दुर्योधन और दुशासन जैसे दुष्ट भी पाये जाते हैं।
लज्जा आती है मुझे इन दरिंदो को मनुष्य कहते हुए भी जिन्हें उस नन्ही सी जान पर दया नहीं आई।
एक दो नहीं पूरे बत्तीस नरपिशाचों ने उसे पांच दिनों तक नोचा ।उस निरीह की चीखों से करुणा का कलेजा ज़रूर फट गया होगा मगर इन दरिंदो का मन नहीं पसिजा ।
ए किसी प्रकार से दया के पात्र नहीं हैं।
लज्जा आती है मुझे अपने न्यायिक व्यवस्था की नपुंसकता पर जो सब कुछ देखकर भी आंखें बंद कर लेती है।
लज्जा आती है मुझे उस नपुंसक समाज के मौन पर जिसने यह सब जानते हुए भी इन आततायियों के दूषित रक्त से अभी तक धरित्री का अभिषेक नहीं किया।
जिस दिन यह समाज ऐसे दुराचारियों के छाती के लहू से धरित्री का केश धोना प्रारंभ कर देगा सच कहें तो उस दिन ही इन पीड़ित आत्माओं के मुखमंडल पर द्रौपदी सी मुस्कान थिरक उठेगी!
यही होगी उनको सच्ची श्रद्धांजलिइसलिए हे भारत।यदि
रिक्शा वाले से लेकर होटल वालों और इस जघन्य अपराध में परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से सामिल सभी दरिंदो में से यदि कोई भी जीवित बचा रहा तो यह सदी इस समाज को कभी माफ़ नहीं करेगी।
क्यों कि कुछ उत्तरदायित्व समाज का ही होता है।



















