
रश्मी शर्मा ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट
नर्सें बनाम महिला आयोग
LNJP अस्पताल वाली दुखद घटना में मेरी पूरी सहानुभूति उस बच्ची और उसके परिवार के साथ है। दोषी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे कठोर सजा मिलनी चाहिए। लेकिन न्याय का रास्ता तथ्यों से होकर जाता है, अनुमानों से नहीं।
मैं लगभग 35-36 वर्ष स्वास्थ्य विभाग में नौकरी कर चुकी हूँ। इसलिए अस्पताल की कार्यप्रणाली को थोड़ा बहुत समझती हूँ। आजकल जिस तरह कैमरों के सामने नर्सों की मिलीभगत की बातें कही जा रही हैं, उससे कुछ सवाल मेरे मन में भी उठते हैं।
पहला सवाल यह है कि क्या पूरी जांच हो चुकी है? यदि नहीं, तो किसी नर्स या पूरे नर्सिंग समुदाय को कटघरे में खड़ा करना कितना उचित है? जिम्मेदार पद पर बैठकर हम बिना तथ्यों के गैरजिम्मेदारी वाले बयान नहीं दे सकते वो भी कैमरे के सामने। सोशल मीडिया वो घास है जो तुरंत,आग पकड़ लेती है और फिर बात हज़ार लोगों के मुंह से होती हुई अपने मायने बदल।लेती है। रेनू जी ने कहा था तुम वहां क्यों नहीं थी मुझे तो।लगता तुम भी मिली हुई जो। बात बदलते बदलते यह बन गई कि nurses मिली हुई हैं। किसी उच्चाधिकारी की डांटने या कुछ लगने भर से बात सच नहीं हो जाती। शायद उन्हें खुद अपना बयान सही नहीं लगा,और नैतिकता दिखाते हुए रेजिग्नेशन दे दिया वरना रिजाइन का कोई कारण नहीं बनता है। वो पद पर रहकर बच्ची के लिए अधिक बेहतर तरीके से लड़ सकतीं थीं।।
दूसरा सवाल यह है कि जिस नर्स का नाम लिया जा रहा है, उसकी अपनी बेटी भी होगी। वह स्कूल या कॉलेज जाती होगी। समाज उसके बारे में क्या सोचता होगा? क्या हमने कभी यह सोचा कि हमारे एक बयान का असर किसी निर्दोष बच्ची की सुरक्षा और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है? एक बच्ची को अभी न्याय मिला नहीं कि हमने दूसरी बच्ची की सुरक्षा में सेंध लगा दी है।
तीसरी बात, सरकारी अस्पताल में फिल्म की तरह नहीं होता जहाँ हर कमरे के बाहर एक-एक नर्स खड़ी हो। सरकारी अस्पतालों में स्टाफ सीमित होता है। अस्पताल में 10-11 ओपीडी चल रही होती हैं और नर्सें केवल 2 या 3 होती हैं। बाकी नर्सों की ड्यूटी वार्ड, कैजुअल्टी, इंजेक्शन रूम और गंभीर मरीजों के बीच बंटी होती है। ऐसे में हर ओपीडी के अंदर हर समय नर्स की मौजूदगी संभव नहीं होती।
यदि किसी अभिभावक को लगता है कि किसी डॉक्टर का व्यवहार अनुचित है तो उसे उसी समय लिखित शिकायत अस्पताल प्रशासन, सिविल सर्जन या उच्च अधिकारियों को देनी चाहिए। क्योंकि बाद में यह कहना कि किसी दूसरे मरीज को बताया था, अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
वैसे भी ओपीडी में मरीज लाइन से एक-एक करके जाते हैं। वार्ड या कैजुअल्टी जैसी स्थिति नहीं होती कि हर समय कोई साथ वाला मरीज मौजूद रहे। इसलिए यह सवाल भी जांच का विषय है कि कथित दूसरा मरीज कौन था और उसने किसी को सूचित किया भी या नहीं?
एक और बात जो शायद सबसे महत्वपूर्ण है। हम अपनी बेटियों को इतना मजबूत क्यों नहीं बनाते कि यदि कोई व्यक्ति उनकी गरिमा पर हाथ डालने की कोशिश करे तो वह वहीं उसका विरोध कर सकें? चाहे वह गरीब की बेटी हो या अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी। आत्मरक्षा का पहला अधिकार उसी बच्ची का है। गलत करने वाले को थप्पड़ मारने की कोई कीमत नहीं लगती, लेकिन वह थप्पड़ कई बार जीवनभर की चुप्पी से ज्यादा असरदार साबित होता है।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि दोष पीड़िता पर डाला जाए। दोष हमेशा अपराधी का ही होता है। लेकिन बेटियों को आत्मविश्वासी और निर्भीक बनाना भी समाज की जिम्मेदारी है।
साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि यदि संबंधित डॉक्टर के खिलाफ पहले से शिकायतें थीं तो उसे दोबारा संवेदनशील जिम्मेदारी पर क्यों लगाया गया? जवाबदेही केवल नर्स, वार्ड बॉय या छोटे कर्मचारियों की ही नहीं होती। प्रशासनिक अधिकारियों और नियुक्ति करने वालों की भी होती है।
मेरा मानना है कि न तो किसी दोषी को बचाया जाना चाहिए और न ही बिना प्रमाण किसी को दोषी ठहराया जाना चाहिए। पीड़ित बच्ची को न्याय मिले, दोषियों को सजा मिले, लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी पूरे पेशे को बदनाम करना भी न्याय नहीं है।
आज जरूरत भावनाओं में बहकर निर्णय देने की नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और संतुलित सोच की है। क्योंकि एक गलत बयान केवल एक व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज और कई निर्दोष परिवारों को प्रभावित कर सकता है।
एक और बात जो रह रहकर मन में उठती है वह यह है कि जब किसी बड़े नेता, मंत्री, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगता है, तब क्या उसके पीए, स्टेनो, ड्राइवर, कार्यालय कर्मचारी या अन्य सहयोगियों को भी उसी प्रकार सार्वजनिक रूप से संदेह के घेरे में खड़ा किया जाता है? क्या कैमरों के सामने उनके नाम लेकर उनसे भी यही प्रश्न पूछे जाते हैं कि उन्हें घटना की जानकारी क्यों नहीं थी? यदि नहीं, तो फिर एक नर्स के मामले में जांच पूरी होने से पहले ऐसी धारणाएँ बनाना कैसे उचित माना जा सकता है? न्याय का सिद्धांत यही कहता है कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी और दोष का निर्धारण तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर हो, न कि केवल उसके पद या उसके आसपास मौजूद होने के आधार पर।



















