
रानी ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास से एक ऐसा रैकेट सामने आया है जिसने ‘किराये की कोख’ (Surrogacy) को धंधा बना लिया है। दैनिक भास्कर के स्टिंग ऑपरेशन ने उस खौफनाक सच्चाई को उजागर किया है, जहाँ लड़कियों की खूबसूरती और रंग-रूप के आधार पर उनके ‘मां’ बनने की कीमत तय की जा रही है।
‘खुफिया कैमरे’ पर कोख की सौदेबाजी
• दाम की बोली: अगर लड़की गोरी और खूबसूरत है, तो बच्चा पैदा करने के ₹15 लाख तक वसूले जा रहे हैं। सामान्य महिला के लिए ₹5 लाख की डील होती है।
• बड़ा नेटवर्क: अस्पताल संचालक अफजल अंसारी का दावा है कि लखनऊ में ही ऐसे 10 सेंटर हैं। रैकेट दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और बिहार तक फैला है।
• कुंवारी लड़कियां भी निशाने पर: इस धंधे में कुंवारी लड़कियों और गरीब महिलाओं को लालच देकर शिकार बनाया जा रहा है।
कैसे चलता है यह पूरा ‘रैकेट’?
1. टारगेट: गिरोह के निशाने पर ऐसे निसंतान कपल होते हैं जिनका IVF फेल हो चुका है।
2. प्रक्रिया: पराए पुरुष का सीमेन (वीर्य) IVF के जरिए लड़की के गर्भ में इंजेक्ट किया जाता है।
3. गोपनीयता: बदनामी से बचने के लिए लड़की को 5 महीने बाद घर से दूर गिरोह के ‘सेफ हाउस’ में रखा जाता है। रिश्तेदारों से कह दिया जाता है कि वह बाहर जॉब कर रही है।
4. डिलीवरी: 9 महीने पूरे होने पर बच्चा कपल को सौंप दिया जाता है और लड़की को उसका हिस्सा दे दिया जाता है।
कानून को ठेंगा, जुबान पर सौदा
गिरोह का सरगना कहता है कि इस धंधे में ‘पेपर’ नहीं, ‘जुबान’ चलती है। एग्रीमेंट के नाम पर कुछ नहीं होता, सब कुछ गैर-कानूनी तरीके से पैसे के दम पर मैनेज किया जाता है। पुलिस की नजरों से बचने के लिए ये लोग राज्य बदलकर (यूपी से बिहार) डिलीवरी करवाते हैं।
समाज और कानून के लिए कुछ कड़वे सवाल (कमेंट में अपनी राय दें):
1. ममता का व्यवसायीकरण: क्या हमारी संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि अब ‘कोख’ को भी सामान की तरह खरीदा और बेचा जा रहा है?
2. गरीबी का फायदा: आर्थिक तंगी की वजह से महिलाएं अपने शरीर का सौदा करने पर मजबूर हैं। क्या इसके पीछे सिर्फ गिरोह का हाथ है या समाज की विफलता?
3. कानून की पकड़: सरोगेसी के सख्त कानून होने के बावजूद खुलेआम अस्पताल संचालक ऐसा दावा कैसे कर पा रहे हैं?
क्या प्रशासन की नाक के नीचे यह सब हो रहा है?


















